“मेरे माता-पिता को कुछ मत कहिए।” ममता दबी ज़बान से बोली और महाभारत हो गया। बाबूजी ने ऐलान कर दिया कि वे यदि अपने बाप के बेटे हैं, तो जीवन भर बहू के हाथ का पानी भी न पीएंगे।
हुआ यह था कि रमेश और ममता की शादी पंद्रह दिन पहले ही हुई थी। वे अपने कमरे में हँसी-ठिठोली कर रहे थे, तभी अचानक पिताजी आ गए और बहू की खिलखिलाहट सुनकर आग-बबूला हो गए। वे बहू को गाली देने लगे। तैश में उन्हें होश ही नहीं रहा और वे उसके माता-पिता पर आ गए कि तमीज़-लिहाज़ कुछ न सिखाया, बस बेहयाई ही सिखाई।
ममता स्वयं को रोक न सकी। उसने प्रतिरोध कर दिया; पर कभी सोचा भी नहीं था कि उसकी एक छोटी सी बात इस तरह का बवाल खड़ा कर देगी। रमेश काँप उठा। ममता तो बाबूजी का स्वभाव जानती नहीं थी, पर वह तो जानता था।
रमेश दौड़कर पिताजी के पैर पकड़कर बहुत रोया-गिड़गिड़ाया, पर बाबूजी की बात तो पत्थर की लकीर थी। बाबूजी की नाराज़गी देखकर ममता भी उनके पैरों पर गिर पड़ी, पर बाबूजी का फ़ैसला अटल था; वे नहीं पिघले। तनतनाते हुए बोले—
“ब्याह के बाद भी जो लड़की मायके का दम भरे, वह न ख़ुद सुखी रह सकती है और न ही दूसरों को सुख दे सकती है। ब्याह के बाद तो हम ही उसके बाप हुए न? हमारा फ़ैसला नहीं बदलेगा।”
रमेश और उसकी पत्नी ने पिताजी के आगे बहुत हाथ-पैर जोड़े, पर पिताजी नहीं पिघले। यहाँ तक कि बहू के बच्चे भी बड़े हो गए, पर उन्होंने अपना प्रण नहीं तोड़ा। अपने खाने-पीने के लिए उन्होंने गाँव की ही एक वृद्धा को रख लिया था। बहू ने दो-एक बार बच्चों से चाय भिजवाने की कोशिश भी की, पर बाबूजी टस से मस नहीं हुए। वैसे वे हमेशा बहू के साथ सहज रहते, उससे बात भी करते, मगर उसका छुआ पानी भी न पीते। बच्चों को भी दुलारते, उनको पढ़ाते और उनके साथ बहुत प्यार से रहते; पर अपनी ज़िद छोड़ने को तैयार नहीं थे। हारकर रमेश और बहू ने हथियार डाल दिए।
छोटा सा परिवार था—माँ थी नहीं, बाबूजी और दो बेटे रमेश और सुरेश। रमेश बड़े थे, बहुत सीधे और शांत स्वभाव के; शायद अपनी माँ पर गए थे। छोटे सुरेश ने अपने पिता का स्वभाव पाया था। बाबूजी गाँव के स्कूल में प्रधानाध्यापक थे—महान क्रोधी, अनुशासनप्रिय और भयंकर ज़िद्दी! वही स्वभाव सुरेश का भी था। वह भी वैसा ही था।
एक बार वह साइकिल पर स्कूल जा रहा था कि एक भैंस से टकराकर गिर गया। भैंस भी बिदक गई और उसने साइकिल को बहुत बुरी तरह से कुचल दिया। ग़नीमत रही कि भैंस ने सुरेश पर अपना ग़ुस्सा नहीं निकाला, फिर भी सुरेश को बहुत चोट आई थी। पर बाबूजी ने आव देखा न ताव, सुरेश की जम कर पिटाई कर दी और बोले—
“तुम्हारी औक़ात भी है साइकिल ख़रीदने की? बाप का पैसा है… उड़ाओ! तुम क्या जानो पैसा कितनी मुश्किल से कमाया जाता है। अब इसे सुधरवाने में जो पैसा लगेगा, वह क्या तुम्हारा बाप देगा? तुम तो बस मौज करो।” कहते हुए बेंत फेंककर बाहर निकल गए।
उन्होंने सुरेश की चोटें भी नहीं देखीं और ऊपर से उसका तन-मन और छलनी कर गए। सुरेश न तो रोया और न ही अपनी चोटों पर मरहम लगवाया; वह तनतनाता हुआ घर से निकल गया और रात को भी न लौटा। रमेश पूरे गाँव में उसे ढूँढता रहा, पर वह नहीं मिला। अगले दिन वह नदी किनारे बरगद के झुरमुट में बेहोश पाया गया। वहाँ से उठाकर उसे सीधे अस्पताल ले गए। बाबूजी पहली बार चिंतित दिखे। जब तक उसे होश नहीं आया, वे अस्पताल में ही बैठे रहे। जब डॉक्टर ने उसे ख़तरे से बाहर बताते हुए कहा कि उसे होश आ गया है, तो वे घर चले गए; फिर वे उसे देखने अस्पताल नहीं गए। सुरेश की नज़रें उन्हें ढूँढती रहीं, पर वे नहीं आए। बस तभी से सुरेश के मन में गाँठ पड़ गई और वह बाबूजी के ख़िलाफ़ हो गया। रमेश ने उसे बताया भी कि वे पूरे दो दिन अस्पताल में बैठे रहे, न भोजन किया न पानी पिया; पर सुरेश का मन मैला हो चुका था। उसने बाबूजी से रार ठान ली और वही काम करने लगा जिसे वे पसंद नहीं करते थे। वह उनके सामने ही सिगरेट पीने लगा। बाबूजी ने देखा तो अपनी बेंत लेकर दौड़े। सुरेश ने बेंत छीन ली और बाहर भाग गया। वह दिन-ब-दिन ज़िद्दी और गुस्सैल होता जा रहा था।
रमेश ने तो अपने बाबूजी को माँ पर भी क्रोधित होते देखा था। वे ग़ुस्से में अपनी बेंत का इस्तेमाल माँ पर भी कर देते थे और कभी पलटकर उनका हाल नहीं पूछते थे; जैसे माँ पर हाथ उठाना उनका हक़ हो। तब रमेश माँ से झगड़ पड़ता कि क्यों वह बाबूजी का विरोध नहीं करतीं! तब वे उसे समझातीं—
“बेटा! बाप से कभी नाराज़ मत होना, वह भी क्रोधी पिता से। ग़ुस्सैल आदमी दिल का बुरा नहीं होता; जैसे उफनता है, वैसे ही शांत हो जाता है। तुम्हारे बाबूजी भी बहुत अच्छे आदमी हैं। तुम उनका हमेशा सम्मान करना, कभी पलटवार न करना।”
इन्हीं नसीहतों का असर था कि रमेश ने अपने पिता के आगे हमेशा सिर झुकाए रखा। पर ये नसीहतें माँ सुरेश को न दे सकीं, क्योंकि जब वह पाँच वर्ष का ही था, तभी वे स्वर्ग सिधार गई थीं।
सुरेश पूरी तरह अपने बाप पर गया था—बेहद हठधर्मी और ग़ुस्सैल! बाप की तरह ही अड़ियल। जो बात एक बार मुँह से निकल गई, वह पत्थर की लकीर होती। एक बार गर्मियों में भाभी की छोटी बहन मोहिनी आई थी। मोहिनी गेहुँए रंग की दुबली-पतली, घनी केश-राशि और बहुत सुंदर नैन-नक्श वाली चंचल लड़की थी। पहले तो सुरेश ने ध्यान नहीं दिया, पर बच्चों के साथ उसकी धमाचौकड़ी ने उसके कठोर हृदय पर हथौड़े बरसा दिए। सुरेश उस पर लट्टू हो गया और ठान लिया कि शादी करेगा तो मोहिनी से ही! रमेश और भाभी ने बहुत समझाया कि बाबूजी कभी राज़ी नहीं होंगे।
“देखो लल्ला! यह शादी न हो सकेगी। बाबूजी हमसे तो ख़फ़ा हैं ही, हमारी बहन को भी न छोड़ेंगे।” भाभी ने समझाया। रमेश ने भी ऊँच-नीच समझाई, पर सुरेश तो ठान ही चुका था कि वही काम करेगा जो बाबूजी की ख़िलाफ़त में हो। बाबूजी ने सुना तो भड़क गए—
“नालायक! तेरी हिम्मत कैसे हुई? जिस घर की बेटी का मैं छुआ पानी भी नहीं पीता, तू ऐसे कमीनों के घर से दूसरी (बहू) भी लाना चाहता है! मेरे जीते-जी तो यह हो न सकेगा।”
बाप और बेटा दोनों ही अपनी बात पर अड़े थे। रमेश ने बाबूजी को समझाना चाह—
“बाबूजी! आप तो अपनी ही चलाते हैं। बूढ़े हो गए हैं पर बदले नहीं।”
“बूढ़ा होगा तेरा बाप… अगर यह शादी हुई तो मेरी लाश पर होगी! मैंने ज़िंदगी में कभी अपने बाप से समझौता नहीं किया, तो क्या अब बेटों से करूँगा?”
“मैं भी आपका ही बेटा हूँ… शादी करूँगा तो मोहिनी से ही, देखता हूँ कौन रोकता है मुझे!” कहकर सुरेश दनदनाता हुआ निकल गया। बाबूजी पीछे से बड़बड़ाते ही रह गए।
सुरेश ग़ुस्से में ही वापस शहर लौट गया और पंद्रह दिन बाद ही मोहिनी से शादी कर ली। उसने पत्र से सूचना दी कि रविवार को बहू को लेकर आ रहा है। बाबूजी ने पत्र पढ़ा और चुपचाप अपने कमरे में चले गए। रमेश बहुत डर गया। वह दौड़कर गाँव के सयानों को ले आया। बाबूजी ने किवाड़ तो खोले पर कुछ न बोले। लोग उन्हें समझाने लगे—
“काहे बुढ़ापे में अपनी मिट्टी पलीद करते हो।” तो किसी ने कहा, “उन्हें उनका जीवन जीने दो, तुम काहे बोलते हो? मत घुसने देना घर में।”
बड़ी बहू भी बहुत रोई, पर बाबूजी के मुँह से एक बोल न फूटा। गाँव वाले उनकी चुप्पी देखकर लौट गए। रमेश ने भी बाबूजी को समझाने की बहुत कोशिश की। बाबूजी बोले—
“मैं अब जीना नहीं चाहता। मेरा मानना है कि 'मार खाकर मत जियो, घावों को मत सियो और माँगकर अमृत मत पियो'। बेटा! मेरा समय पूरा हुआ।”
“बाबूजी! आप दोनों ज़िद्दियों के बीच मैं ही पिस रहा हूँ, मेरा क्या दोष है? मैं किस बात की सज़ा भुगत रहा हूँ?”
“नहीं, तुम्हारा कोई दोष नहीं है बेटा… सहन करने वाला हमेशा टिका रहता है। मैं ज़िद करके सब बिगाड़ चुका हूँ; दूध का दही और दही का मही कर बैठा। अब बहुत हुआ। अब सुरेश को तुम्हें ही संभालना है, मैं तो अपनी ज़िद में सब कुछ गँवा बैठा हूँ।”
अगले दिन बाबूजी की लाश पंखे से लटकी मिली; रमेश सन्न रह गया। सुरेश भी आ चुका था, वह और मोहिनी भी हतप्रभ रह गए। सुरेश जड़ हो गया; हमेशा बड़बोले रहने वाले सुरेश ने चुप्पी ओढ़ ली। बाबूजी के सभी कारज पूरे हो गए, पर सुरेश ने किसी में भी हाथ नहीं लगाया क्योंकि पिताजी यही चाहते थे। तेरह दिन पूरे हो गए। मोहिनी के पिता भी आए थे। जब वे जाने लगे तो सुरेश बोल उठा—
“आप मोहिनी को ले जाइए। अब इसके साथ मेरा निबाह नहीं हो सकेगा।” मोहिनी के पिता भी अपराध-बोध से ग्रस्त थे, वे चुपचाप बेटी को लेकर चले गए।
अगले दिन सुरेश भी अपने काम पर लौट गया। उसने पलटकर मोहिनी की सुध न ली। क़रीब डेढ़ महीने बाद एक दिन सुरेश गाँव आया। रमेश ने उसे गले लगा लिया और पूछा—
“क्या बात है भाई? कुछ परेशान लग रहे हो? कैसे आना हुआ?”
“मैं संन्यास ले रहा हूँ भाई… आपसे आख़िरी बार मिलने आया हूँ।”
“संन्यास लेना चाहते हो… मज़ाक समझ रखा है क्या? और यदि मोहिनी को छोड़ना ही था, तो पिताजी को आत्महत्या करने के लिए क्यों मजबूर किया? भला यह भी कोई बात हुई कि सब कुछ छोड़कर चले जाना चाहते हो!”
“बस भाई! प्रायश्चित करना चाहता हूँ। ज़मीन-जायदाद सब तुम्हारी, अब नहीं लौटूँगा।”
“बस, तुम और बाबूजी एक जैसे ही रहे; न वे अपनी ज़िद छोड़ सके और न ही तुम छोड़ोगे।”
“आत्महत्या कर नहीं सकता और मोहिनी को अपना नहीं सकता, तो दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं सूझता।” सुरेश का कहते-कहते गला भर आया।
“प्रायश्चित करो, यही तुम्हारा पितृतर्पण होगा। नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करो।”
सुरेश चुप रह गया। सबेरा हुआ, वह सामान बाँधकर चलने को तैयार था। रमेश के पैर छूने लगा तो उसने उसे गले लगाया और बोला—
“सुरेश! तुम जाना चाहते हो तो ज़रूर जाओ, पर मेरे एक सवाल का जवाब देते जाओ।”
“पूछो भैया, पूछो।”
“सुरेश! तू तो बड़ा ज्ञानी है न, मैं तो मूर्ख ही रहा। पर बता, तूने कभी सोचा कि यह सब आख़िर क्यों हुआ? तू बाबूजी से क्यों घृणा करता है?”
सुरेश थोड़ी देर तो चुप रहा, फिर बोला—
“उनके क्रोध, ज़िद और अड़ियलपन से; माँ पर, हम, तुम और भाभी पर उनके अतिरेक क्रोध के कारण।”
“तो भैया! बाबूजी के जिस दुर्गुण को तुम सहन न कर सके, उसी से तो तुम भी ग्रस्त हो न? पिताजी तो पूर्णतः विफल, विवश और परास्त होकर गए। उनके जिस घमंड को तुम तोड़ना चाहते थे, आज स्वयं भी तो उसकी गिरफ़्त में आ चुके हो। तुम भी तो वही कर रहे हो। जिस तरह बाबूजी पलायन कर गए, वैसे ही तुम संन्यास की आड़ में पलायन ही तो कर रहे हो। मेरी बात यदि समझो, तो मोहिनी से माफ़ी माँगो और क्रोध तथा ज़िद को त्यागो। तुम्हारा प्रायश्चित यही है, न कि संन्यास लेना।”
सुरेश रो पड़ा और भाई के कदमों में बैठ गया।
- मधूलिका श्रीवास्तव
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