जो पाँच सौ रुपये का,
हिसाब तक नहीं जानती।
वह महीने के वेतन को,
क्या समझ पाती!
उसे तो बस इतना पता है,
जब घर के सामान घटने लगें,
और बिना कुछ कहे घर की सारी ज़रूरतें...
पूरी होने लगें, तब
वह समझ जाती है... इनका वेतन आ गया है।
न पहले अपने हिस्से का माँगा था...
न आज माँगती है...
बस इतना जानती है,
मैं हिस्सा हूँ इस घर का,
जो भी इस घर के हिस्से में आएगा
वह सब मेरा है...
- खुशी कुमारी
पटना, बिहार
पीएचडी (अध्ययनरत)
दो काव्य पुस्तकें प्रकाशित , यूजीसी मान्यता प्राप्त पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित ।