यह बिहार, वह बिहार है जो, समर सदा ही जीता।
इस मिट्टी के कण-कण में है, जनक-दुलारी सीता।।
शांति के हम पूज्य भूमि हैं, बुद्ध बनाने वाले।
अज्ञानियों को ज्ञान देकर, शुद्ध बनाने वाले।।
हम ज्ञान-नदी नालंदा हैं, कल-कल बहते हैं।
मुक्ति-धाम हम पूज्य गया हैं, वेद-ग्रंथ ये कहते हैं।।
हम शृंगी ऋषि, हम जल-मंदिर, पावन परम पुनीता।
इस मिट्टी के कण-कण में है, जनक-दुलारी सीता।।
कर्ण की यही कर्म-भूमि है, महावीर की धरती।
वैभवशाली अतीत इसका, सजती रोज़ सँवरती।।
'सवा लाख से एक लड़ाकर', युद्ध जिताने वाले।
आर्यभट्ट की पुण्य-भूमि हम, शून्य बनाने वाले।।
हम विष्णुगुप्त, हम गुरु नानक, हर युद्ध यहाँ जीता।
इस मिट्टी के कण-कण में है, जनक-दुलारी सीता।।
-- अभिमन्यु प्रजापति (लखीसराय)
बिहार की अमूल्य विरासत का महिमामंडन करती अत्यंत सुंदर कविता की रचना के लिए हार्दिक बधाई
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