अपने किरदार से ऊँचे नहीं बोला करते,
पास दरिया हो तो क़तरे नहीं बोला करते।
सब ने ले ली है हुकूमत से यहाँ पर पदवी,
अब मेरी बात पे सारे नहीं बोला करते।
हम गवाहों को भला कैसे, कहाँ से लाते,
जब मेरे पाँव के छाले नहीं बोला करते।
हमने सीखा है बुज़ुर्गों से अक़ीदत ये भी,
बाप की बात पे बेटे नहीं बोला करते।
तुमको मंज़िल की ज़रूरत है तो चलते ही रहो,
किस तरफ़ चलना है, रस्ते नहीं बोला करते।
ये ज़रूरी है ज़रा तुम ही तजुर्बे सीखो,
आते-जाते हुए ख़तरे नहीं बोला करते।
अब तो चिड़ियों की भी आती है कहाँ घर में सदा,
जैसे स्कूल में बच्चे नहीं बोला करते।
– डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री
असिस्टेंट प्रोफेसर
गया, बिहार