वास्तव में,
औरत का कोई घर नहीं होता;
पिसती है दो पाटों के बीच,
अंतरिक्ष के शून्य की तरह,
खोजती है अपना वजूद।
वास्तव में,
औरत का कोई अपना नहीं होता;
परिस्थितियों के संग
बनते-बिगड़ते रिश्ते,
तिल-तिल लड़ती,
अपने सम्मान के लिए।
वास्तव में,
औरत का कोई हक नहीं होता;
जन्म लेते पिता का हक,
शादी के बाद पति का हक,
बुढ़ापे में बच्चों का हक।
वास्तव में,
औरत का अपना वक्त भी नहीं होता।
मायके में समझौता कि—
बेटी घर की इज्जत है,
ससुराल में समझौता कि—
बहू का एक दायरा है,
फिर लापरवाही की चक्की में
पिसता बुढ़ापा।
वास्तव में,
औरत होती है परकटा परिंदा!
- डॉ. अर्चना सिंह चौहान "शुभाक्षी"
- परिचय: शिक्षिका और साहित्यकार।
- शिक्षा: M.A. (हिन्दी/इतिहास), B.Ed, TET, M.Phil।
- निवास: 331-H3, मछरिया रोड, नौबस्ता, कानपुर (208021)।
- साहित्यिक कार्य: 'प्रतिलिपि', 'अमृत राजस्थान', 'हिंदुस्तान', 'अमर उजाला' सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। 'कोरोना एवं कलम', 'राम राज्य', 'माँ', 'मौन के स्वर' आदि कई साझा संग्रहों में योगदान। आगामी कृतियों में काव्य संग्रह 'भावांजलि' और 'कृष्णामृत' शामिल हैं। संपादन और समीक्षा कार्यों में सक्रिय।
- प्रमुख सम्मान: भाषा गौरव सम्मान (मप्र), विधावाचस्पति सारस्वत सम्मान, विद्या सागर सम्मान (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ), शक्ति ब्रिगेड साहित्य गंगा सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित।