मोहन के कमरे की खिड़की से हमेशा चमेली की महक आती थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सा सूनापन था। प्रियांशु ने तीन साल उस सूनेपन को अपने समर्पण से सींचने की कोशिश की थी। मोहन को जो पसंद था वो वही करती। सुबह से शाम तक बिना माँगे उसकी सारी जरूरतों का ख़्याल रखती। यहाँ तक कि मोहन को शाम में खामोशी पसंद थी, तो वह पायल उतारकर चलती। पर मोहन की रिक्तता वो नहीं भर पाई। दोनों साथ होकर भी नदी के दो किनारे बने रहे।
फिर गाँव के तालाब किनारे संन्यासियों का डेरा पड़ा। एक सुबह, चमेली की महक गायब थी, खिड़की खुली थी और बिस्तर खाली था। मोहन बिना कोई खत छोड़े, उस टोली के साथ जा चुका था।
प्रियांशु अपने कमरे में मोहन की चीजों को सहेज रही थी और उसे सीने से लगाकर रो रही थी। तभी उसके हाथ में एक पुरानी डायरी आई। उसके पन्ने पलटते ही प्रियांशु के पैरों तले जमीन खिसक गई। डायरी में गाँव की सरहद पार ब्याही गई किसी 'राधा' का नाम और उसके बिछड़ने का दर्द चीख रहा था। प्रियांशु को समझ आ गया कि तीन साल से वह जिस शून्य से लड़ रही थी, वह क्या था।
तभी उसकी सास ने आँगन में अपनी छाती पीटना बंद किया और सारा ठीकरा प्रियांशु के सिर मढ़ना शुरू कर दिया, "मेरे कुल का दीया ही बुझ गया! जरूर इस औरत के ही करम खोटे थे। इस सजीले रूप का क्या फ़ायदा जो पति को बाँध नहीं पाई। इस अभागी के प्रेम में ही कोई ऐसी कमी रही होगी जो मेरा बेटा संसार से विमुख हो गया।"
आँगन में सन्नाटा पसर गया। सब उम्मीद कर रहे थे कि प्रियांशु फूट-फूट कर रो पड़ेगी।
लेकिन प्रियांशु ने आँख का आख़िरी आँसू पोंछा, हाथ में दबी डायरी को भींचा और पलटकर अपनी सास की आँखों में झाँका। उसके चेहरे पर अब लाचारी नहीं, सच्चाई की चमक थी।
उसने धीमे मगर अडिग स्वर में कहा—
"कमी मेरे इस सजीले रूप या प्रेम में नहीं थी माँ जी! कमी आपके बेटे के उस अधूरे अतीत में थी, जिसकी राख को छुपाने के लिए आप मुझे चमेली का कफ़न पहनाकर इस घर में ब्याह लाई थीं। एक टूटा हुआ पुरुष, किसी के प्रेम का संबल कैसे बनता? आज वो भाग गया, तो आप अपनी गलती का दोष मेरे माथे मढ़ रही हैं! लेकिन क्या मेरे इस आख़िरी प्रश्न का उत्तर है आपके पास... मेरे साथ हुए इस छल का उत्तरदायी कौन है? आप या आपका बेटा?"
सास का हाथ छाती पर ही थमा रह गया, पूरा आँगन निरुत्तर था। प्रियांशु ने अपनी कलाई से मोहन के नाम की चूड़ियाँ उतारकर उसी डायरी पर रख दीं और बाहर की ओर कदम बढ़ा दिए।
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डॉ. प्रीति सुमन
सीतामढ़ी, बिहार
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लघुकथा
आपके द्वारा रचित रोचक एवं मार्मिक लघुकथाओं को पढ़कर बहुत आनंद आ रहा है मैम।
जवाब देंहटाएंऐसे ही पोस्ट करते रहिए, हम पढ़ते रहेंगे