संभल-संभल के पाँव रखो तो अच्छा है (कविता) — किशोर छिपेश्वर "सागर"


अपनेपन का भाव रखो तो अच्छा है
समदृष्टि सम-भाव रखो तो अच्छा है
समर-भूमि में जब भी उतरो लड़ने को,
ज़रा बचाकर दाँव रखो तो अच्छा है।

इस जीवन में कुछ मक़सद तो होना है,
सहज-सरल बरताव रखो तो अच्छा है,
यार अदब में जीना ही तो जीवन है,
सादा सा पहनाव रखो तो अच्छा है।

सबसे मिलना-जुलना अच्छा है लेकिन,
मिलने में ठहराव रखो तो अच्छा है,
अदब की महफ़िल में आए हो "सागर" तुम,
संभल-संभल के पाँव रखो तो अच्छा है।


— किशोर छिपेश्वर "सागर"
बालाघाट


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