“आहे! सबेरे-सबेरे धनेसर कहाँ निकल गेल? एतवार रहई, आजो त दूरा-दरबजा पर रहीत। कोनो टहल-टिकोला होइतई, से करीत। घर के एगो खर उसकाबे के न चाहइत हए।” – धनेसर के मतारी ओक्कर बाबूजी से पुछइत कहलथिन।
रमेसर सिंह कहलथिन – “गेल होएत अप्पन ओहे धनेसरा दोस कन। एकरा अप्पन औकाद के तनिको खेआल न रहइत हए।” तनिके देर में......।
“देखू! लाट साहेब आ रहलन ह।” - धनेसर के बाबूजी कहलथिन।
धनेसर के मतारी – “आरे! भोरे-भोरे कहाँ चल जाइत हते। बाप.........”
बीचे में बात काट के – “कोनो घास गढ़े थोड़े गेल रही।”
मतारी – “आरे! खेत में जन लागल हई, तनी जा के देखितही न!”
“रहे दे ऊ सब। हम खुरपी-कोदारी न धरबऊ।” – कह के कोठली में चल गेलई।
धनेसर के दोस अखबार ले के मतारी के हाथ में दे के चल गेलई। धनेसर के बाबूजी अइलन, त कनिआ कहलथिन – “हे! देखिअऊ त, एह में कथी लिखल हई। धनेसरा रख गेल हs।”
रमेसर सिंह – “उँ..., लाट साहेब!”
“आहे, की भेलई?” – धनेसर के मतारी अकचकाएले पुछलथिन।
रमेसर सिंह – “बेटा लाट साहेब हो गेल।”
धनेसर के मतारी मुँह बएले रह गेलथिन.......।
— डॉ. विद्या चौधरी
पटना , बिहार
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