लाट साहेब(बज्जिका लघुकथा) — डॉ. विद्या चौधरी


“आहे! सबेरे-सबेरे धनेसर कहाँ निकल गेल? एतवार रहई, आजो त दूरा-दरबजा पर रहीत। कोनो टहल-टिकोला होइतई, से करीत। घर के एगो खर उसकाबे के न चाहइत हए।” – धनेसर के मतारी ओक्कर बाबूजी से पुछइत कहलथिन।

रमेसर सिंह कहलथिन – “गेल होएत अप्पन ओहे धनेसरा दोस कन। एकरा अप्पन औकाद के तनिको खेआल न रहइत हए।” तनिके देर में......।

“देखू! लाट साहेब आ रहलन ह।” - धनेसर के बाबूजी कहलथिन।

धनेसर के मतारी – “आरे! भोरे-भोरे कहाँ चल जाइत हते। बाप.........”

बीचे में बात काट के – “कोनो घास गढ़े थोड़े गेल रही।”

मतारी – “आरे! खेत में जन लागल हई, तनी जा के देखितही न!”

“रहे दे ऊ सब। हम खुरपी-कोदारी न धरबऊ।” – कह के कोठली में चल गेलई।

धनेसर के दोस अखबार ले के मतारी के हाथ में दे के चल गेलई। धनेसर के बाबूजी अइलन, त कनिआ कहलथिन – “हे! देखिअऊ त, एह में कथी लिखल हई। धनेसरा रख गेल हs।”

रमेसर सिंह – “उँ..., लाट साहेब!”

“आहे, की भेलई?” – धनेसर के मतारी अकचकाएले पुछलथिन।

रमेसर सिंह – “बेटा लाट साहेब हो गेल।”

धनेसर के मतारी मुँह बएले रह गेलथिन.......।


— डॉ. विद्या चौधरी

        पटना , बिहार 



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