रखते कहाँ तलक सभी रिश्तों को जोड़ के,
मुश्किल है साथ चलना भरोसे को तोड़ के।
क़ीमत बहुत चुका दी शराफ़त की दोस्तो!
अब रख दिया है ज़ीस्त का पन्ना वो मोड़ के।
शायद ही ज़िंदगी में दोबारा वो आएगा,
जो वक़्त जा चुका है मुझे ख़ुद निचोड़ के।
डूबा हुआ हूँ मैं उन्हीं रंगों में आज तक,
तितली गई है जो मिरी उंगली पे छोड़ के।
दुनिया को देखने का वो चश्मा बदल गया,
उसने जगा दी मुझ में मुहब्बत झिंझोड़ के।
जो हाशिए के लोग हैं उनकी भी सोचिए,
नइया लगेगी पार न पतवार छोड़ के।
उनको दया किसी पे भी आती नहीं किरन,
सब कुछ वो छीन लेते हैं गर्दन मरोड़ के।
- प्रेमकिरण
पटना, बिहार
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