अतुल कल रात्रि अपनी पत्नी व बच्चों को वापस लाने ट्रेन से निकला था। सुबह माँ ममता ने ट्रेन से उतरने के पूर्व अतुल से बात की व प्यार भरी हिदायतें दीं— "पहुँचते ही सभी से बात करा देना।"
ममता अपने कामों में व्यस्त हो गई। शाम तक अतुल व बहू सारिका का कोई फोन नहीं आया। ममता ने शाम को कॉल किया, तो बेटे और बहू दोनों के फोन 'नॉट रीचेबल' आ रहे थे।
"कितने नालायक हैं दोनों, ससुराल पहुँचते ही माँ को भूल गया..." ममता के मन में विचार आया। "सारिका भी तो बता सकती थी कि मम्मी जी ये आ गए। पर बहुएँ कब सासों की हुई हैं, दिन-रात इनकी सेवा करो और ज्यों ही मुँह फेरा, भूल गईं मम्मी जी को!" बहू के लिए ममता के मन में आक्रोश आ गया।
ममता रात भर बेचैन थी, पर समधिन को फोन नहीं किया। उनसे भी तो कुशल-क्षेम पूछी जा सकती थी, लेकिन वह कमाऊ लड़के की माँ जो थी (अहं आड़े आ रहा था)।
सुबह होने पर बेटे का फोन आया, वह कुशल-क्षेम पूछ रहा था। बेचैन ममता ने बेटे को जली-कटी सुना दी।
"लो, अपनी बहू से बात करो मम्मी," कहकर अतुल ने फोन सारिका को दे दिया।
"मम्मी जी प्रणाम! सॉरी मम्मी जी, घर जाते समय हमारी कार का एक्सीडेंट हो गया था। एक बच्चे को बचाने के चक्कर में कार डिवाइडर पर चढ़ गई थी। इनको सिर में चोट लग गई थी और हम रात्रि दस बजे से हॉस्पिटल में एडमिट थे। आपको बताते तो आप चिंता करतीं, परेशान होतीं... बस इसीलिए बात नहीं की मम्मी जी। अब ये बिल्कुल ठीक हैं व परसों सुबह हम सब आपके पास होंगे।"
यथार्थ जानते ही ममता की आँखें बरसने लगीं। उनमें से अपने बच्चों के लिए 'अनुराग सरिता' (प्रेम की नदी) प्रवाहित हो रही थी।
- अरुण कुमार जैन
भारतीय रेलवे से सेवा निवृत सिविल इंजिनियर
अमृता हॉस्पिटल, सेक्टर 88,
फ़रीदाबाद, हरियाणा
इंजीनियर श्री अरुण कुमार जैन जी की लघुकथा पढ़ी। आज के युग में भी सभी माँओं की ममता तो हमेशा की तरह ही हैं पर अति आधुनिकता ने बहू बेटों के हृदय परिवर्तित कर दिए हैं। ऐसे में एक सकारात्मक दृष्टिकोण, समाज को देती जैन साहब की यह लघुकथा प्रशंसनीय है। हार्दिक बधाई जैन साहब।
जवाब देंहटाएं