भाषा - संवाद (रूपक-काव्य) -सत्यम् दुबे 'शार्दूल'

कौन बड़ा है, कौन है छोटा,

इसकी हो पहचान,

इतने से ही बढ़ता जग में

प्रतिद्वंद्वी का मान। १।


​सोच यही तत्सम शब्दों ने

ली देशज से होड़,

तद्भव और विदेशी का था

देशज से गठजोड़। २।


​किंतु बात यह समझ न पाया

तत्सम ऐंठा-ऐंठा,

किसी रोज़ आकर दरवाज़े

देशज के वह बैठा। ३।


​ज़ोर लगाकर चिल्लाया वह—

"देशज! बाहर आओ,

पहले मैं था या तुम पहले,

आज अभी बतलाओ।" ४।


​कई बार जब चिल्लाया तो

देशज बाहर आया,

देख दृश्य भौचक्का तत्सम,

साथ था दो को लाया। ५।


​उन दोनों में एक तो उसके

बेटे जैसा तद्भव,

उसका सब कुछ समझा तत्सम

हुआ था कैसे उद्भव। ६।


​दूजा शत्रु पुराना

खुद को कहे विदेशी भाई,

किंतु खोदता भारत-भाषा

में वह गहरी खाई। ७।


​तत्क्षण गहरा सोचा तत्सम,

यह निष्कर्ष निकाला,

प्रश्न नहीं अब उठे कभी भी—

किसने किसको पाला। ८।


​चलो आज से देशज जग में

तुम ही श्रेष्ठ कहाओ,

और जगत में फूलो भाई

और मान तुम पाओ। ९।


​किंतु विदेशी से हे भाई!

मोह नहीं है अच्छा,

जान रहे हो तुम भी सब कुछ

नहीं विदेशी सच्चा। १०।


​हममें-तुममें फूट डालकर

वह ही लाभ उठाता,

आपस में वह बैर कराकर

अपनी जय करवाता। ११।


​और इस तरह देशज, तत्सम,

तद्भव को ले साथ,

जय भारत, जय हिन्दी कहकर

ऊँचा रखते माथ। १२।


​— सत्यम् दुबे 'शार्दूल'

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका