कौन बड़ा है, कौन है छोटा,
इसकी हो पहचान,
इतने से ही बढ़ता जग में
प्रतिद्वंद्वी का मान। १।
सोच यही तत्सम शब्दों ने
ली देशज से होड़,
तद्भव और विदेशी का था
देशज से गठजोड़। २।
किंतु बात यह समझ न पाया
तत्सम ऐंठा-ऐंठा,
किसी रोज़ आकर दरवाज़े
देशज के वह बैठा। ३।
ज़ोर लगाकर चिल्लाया वह—
"देशज! बाहर आओ,
पहले मैं था या तुम पहले,
आज अभी बतलाओ।" ४।
कई बार जब चिल्लाया तो
देशज बाहर आया,
देख दृश्य भौचक्का तत्सम,
साथ था दो को लाया। ५।
उन दोनों में एक तो उसके
बेटे जैसा तद्भव,
उसका सब कुछ समझा तत्सम
हुआ था कैसे उद्भव। ६।
दूजा शत्रु पुराना
खुद को कहे विदेशी भाई,
किंतु खोदता भारत-भाषा
में वह गहरी खाई। ७।
तत्क्षण गहरा सोचा तत्सम,
यह निष्कर्ष निकाला,
प्रश्न नहीं अब उठे कभी भी—
किसने किसको पाला। ८।
चलो आज से देशज जग में
तुम ही श्रेष्ठ कहाओ,
और जगत में फूलो भाई
और मान तुम पाओ। ९।
किंतु विदेशी से हे भाई!
मोह नहीं है अच्छा,
जान रहे हो तुम भी सब कुछ
नहीं विदेशी सच्चा। १०।
हममें-तुममें फूट डालकर
वह ही लाभ उठाता,
आपस में वह बैर कराकर
अपनी जय करवाता। ११।
और इस तरह देशज, तत्सम,
तद्भव को ले साथ,
जय भारत, जय हिन्दी कहकर
ऊँचा रखते माथ। १२।
— सत्यम् दुबे 'शार्दूल'
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश