बिहाइल मरद (लघुकथा) - सेवा सदन प्रसाद

"ओ रिक्शावाला! इधर आ।"  
"रिक्शावाला नहीं, रिक्शावाली!" धनिया पलटकर जवाब दी।  
मैं चुपचाप रिक्शा में बैठ गया और बोला— "चलो चाँदचौरा।"  
वह बहुत ही मेहनत से रिक्शा खींचने लगी। मैं तब संवेदनशील हो गया और पूछा— "तुम्हारा पति क्या करता है?"  
"दारू पिया हई अउर का!"  
"अरे, बिहार में तो दारू बंद है!"  
"सरकारी बात मत करा। ईहाँ कोसे-कोस पर कलाली हय। बस पी के अंगना में पड़ल रहा हय। हमरा दो-दो गो बुतरू हय। पेटवा भरे के खातिर रिक्शा चला रहिले हय।"  
"जब वह तुम लोगों का पेट नहीं पाल सकता, तो उसे छोड़ क्यों नहीं देती?"  
"ऐसे काहे कहा हो बाबू! बिहाइल मरद हई। गलत संगत में पड़ के शराबी बन गेले हय। अब ओकरा छोड़ के दूसरा बियाह करूँ और ऊ जुआरी निकले, फिर तीसरा रंडीबाज़, त हमर जीनगी तो चौपटे हो जाई!"  
"पर अभी भी तो बुरा हाल ही है न!"  
"मालिक, बड़न लोग के बात अलग हय। हम ओकरा छोड़ के कहां जाईं! समस्या सुलझावे के खातिर ओकर उपाय करना है। अखिर हमर मरद है, हम जाना हिय दरद। अभी लड़कन के देखभाल वही करा हई। धीरे-धीरे सुधर रहले हई, एक न एक दिन आदतवा छुटिए जइतय। हमरा समस्या के समाधान चाही, जीनगी भर के मुसीबत नहीं। अब तो बस लड़कन के खातिर जिए ला हई।"  


- सेवा सदन प्रसाद
    मुंबई, महाराष्ट्र 
मो. 9619025094  


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