समाज पहले है और बाद में साहित्य। व्यक्तियों से समाज बनता है और समाज में साहित्य होता है। समाज एक कारक है; यह काल, पात्र और परिस्थितियों का संवाहक है। घटनाओं की अभिव्यक्तियों का, समय और व्यक्तियों की स्थिति-परिस्थितियों का अवलोकन कर अंकित करने वाला (साहित्य) महाभारत का 'संजय' है। जो देखता है, महसूस करता है और भोगता है, उसे पन्नों पर अंकित कर भविष्य की गोद में दे देता है।
साहित्य समाज का अभिरक्षक (custodian) है। वह वर्तमान काल का गवाह है, भूतकाल का अभिरक्षक एवं भविष्य काल का दिशा-निर्देशक है तथा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शक है। साहित्य संचित ज्ञानकोश के साथ-साथ धरोहर है। विद्वानों के द्वारा साहित्य को समाज का 'आईना' कहा जाता है; लेकिन हमें गहराई से सोचना पड़ेगा कि क्या साहित्य वास्तव में समाज का आईना है? अगर आईना है, तो समाज के किस समय तक के लिए है? आईने का काम है कि जो उसके सामने आता है, उसे तत्क्षण ज्यों-का-त्यों हूबहू दिखा देना। लेकिन आईने के सामने से हटने के बाद वह बीते हुए समय की प्रतिछाया को नहीं दिखा पाता। साहित्य समाज के वर्तमान में हुए सभी प्रतिबिंबों को एवं भूतकाल के प्रतिबिंबों को भविष्य के लिए सुरक्षित रख लेता है और धरोहर का काम करता है तथा अमानत बना रहता है।
साहित्य और समाज में अन्योन्याश्रित संबंध है। साहित्य समाज पर आश्रित रहता है, लेकिन समाज साहित्य पर (पूर्णतः) आश्रित नहीं रहता। समाज भविष्य में साहित्य से निर्देशित होता भी है और नहीं भी होता है। साहित्य समाज का आईना है, लेकिन सिर्फ वर्तमान काल के लिए ही। हमारे सामने इसके बहुत-से उदाहरण हैं। समाज के बीच साहित्य है, लेकिन उस साहित्य का समाज नहीं है। जैसे—सिंधु घाटी, मोहनजोदड़ो, पाषाण युग, लौह युग, महाभारत युग, वैदिक युग आदि का साहित्य समाज में उपलब्ध है, लेकिन उन युगों का समाज (अब) नहीं है। आईना कभी साहित्य नहीं हो सकता; वह प्रतिबिंब देता है, जनहित नहीं कर सकता। साहित्य समाज का हित करता है; समाज को सही और गलत का दिग्दर्शन करता और करवाता है।
निष्कर्षतः, हम कह सकते हैं कि समाज से साहित्य बनता है और बिगड़ता है। यह साहित्य का अनिवार्य तत्व है जिसके बिना साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह साहित्य के शरीर का अंग-प्रत्यंग और प्राण है।
— सियाराम यादव मयंक
विद्या वाचस्पति सह गजलकार,
मधेपुरा, बिहार।