हे दुर्गा भवानी, ओ माँ शेरावाली
शरण में तुम्हारे, मैं अब आ गया हूँ
भटकते -भटकते, बहुत थक चुका हूँ
जहाँ छोड़ तेरे, शरण आ गया हूँ।
नहीं जग में मेरा, कोई भी है रहबर
तुम्हारे सिवा माँ, मेरा तो यहाँ पर
है सब से निराली, तू ही मेहरावली
मैं बन्धु तुम्हारे, शरण आ गया हूँ।
मेरे सर पे शोभे, तुम्हारे चरण रज
तेरी ही कृपा से, चमकता है सूरज
दया तो दिखाओ, गले से लगा लो
मैं बन्धु तुम्हारे, शरण आ गया हूँ
बड़ी भोली भाली, ओ माँ शेरावाली
शरण में तुम्हारे मैं भी आ गया हूँ।।
- अविनाश बन्धु
पटना, बिहार