नज़रों से नज़रें मिलीं (ग़ज़ल) - मोईन गिरिडीहवी

नज़रों से नज़रें मिलीं, क्या यह हसीं सौगात है!
बेकली बढ़ने लगी, क्या शिद्दत-ए-जज़्बात है!

यों तो दिल से दिल्लगी होने लगी है रात-दिन,
अब ज़रा चेहरा दिखा, आई मिलन की रात है।

आइए तो पास, क्यों न प्यार की बातें करें?
अब हमारे प्यार की आई हसीं बारात है।

शौक़ से तोहफ़ा समझकर ले लो मेरा दिल यहाँ,
फिर कभी न तुम समझना यह कोई ख़ैरात है।

क्या बताऊँ हाल-ए-दिल ए मोईन इस संसार में,
"चार दिन की चाँदनी है, फिर अँधेरी रात है।"


— मोईन गिरिडीहवी 
      पटना, बिहार 

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