नज़रों से नज़रें मिलीं, क्या यह हसीं सौगात है!
बेकली बढ़ने लगी, क्या शिद्दत-ए-जज़्बात है!
यों तो दिल से दिल्लगी होने लगी है रात-दिन,
अब ज़रा चेहरा दिखा, आई मिलन की रात है।
आइए तो पास, क्यों न प्यार की बातें करें?
अब हमारे प्यार की आई हसीं बारात है।
शौक़ से तोहफ़ा समझकर ले लो मेरा दिल यहाँ,
फिर कभी न तुम समझना यह कोई ख़ैरात है।
क्या बताऊँ हाल-ए-दिल ए मोईन इस संसार में,
"चार दिन की चाँदनी है, फिर अँधेरी रात है।"
— मोईन गिरिडीहवी
पटना, बिहार