कितनी ज़ालिम है यह दुनिया,
ओढ़ रखे हैं चेहरों पर आवरण!
दिखती कुछ और है, करती कुछ और,
साज़िशें बुनती है हर क्षण—
मिटाने को तुम्हारा वजूद।
निरंतर लगे हैं ये साबित करने में,
कि जिस ज़िम्मेदारी का भार
संभाल रखा है तुमने अपने कंधों पर,
अयोग्य हो तुम उसे मुक़ाम दिलाने में।
मगर, मैं कह दूँ अपने स्वाभिमान से—
कि मत घबराना उन हालातों से,
जो तोड़ना चाहते हैं तुम्हारा हौसला;
इन्हीं परिस्थितियों से जूझकर तो,
तुम खुद को साबित कर पाओगे!
योग्य होकर पा ली विरासत, तो क्या पाया?
बात तो तब है, जब मिटा सको
इस अयोग्य होने के कलंक को;
और छू लो उन ऊँचाइयों को,
जिसके लिए तुम हमेशा समझे गए अयोग्य!
तुम्हें माँजेंगी वही ठोकरें,
जो निरंतर मिल रही हैं इस सफ़र में;
और तब तुम्हारी चमक से चकाचौंध होंगी वो आँखें,
जिनमें तुम चुभते रहे अब तक शूल बनकर।
— डॉ. सीमा कुमारी
सहायक प्राध्यापक सह अध्यक्ष
हिंदी विभाग, आर.एस.एस. महिला महाविद्यालय, सीतामढ़ी
संपर्क: sss2seema@gmail.com