हे पुण्य धरा के पुरुष! (कविता) - अभिलाषा सिंह

पुण्य धरा के पुरुष! तुम्हारी
सदा-सर्वदा जय हो।
पग-पग पर बनते संबल,
पौरुष, भुजबल अक्षय हो।
पुण्य धरा के पुरुष! तुम्हारी...

भट्टी में श्रम की जलते,
हैं दिवस तुम्हारे बीते।
कुंदन बनकर रातों में,
तुम देवतुल्य हो जीते।
रजनी के सौभाग्य तुम्हारी,
हर पल आत्मविजय हो।
पुण्य धरा के पुरुष! तुम्हारी...

अनुपम है वात्सल्य कि तुम,
संतति के भाग्य-विधाता।
हो आँगन के सूर्य, तुम्हीं से
पोषण का है नाता।
पराक्रमी हो, वीर भले ही,
केवल किंतु प्रणय हो।
हे पुण्य धरा के पुरुष! तुम्हारी...

विपदा की घड़ियों में तुम,
तत्क्षण-तत्पर रहते हो।
प्रतिपालक हो, पूज्य तुम्हीं,
सबकी रक्षा करते हो।
तुझ पर ही सर्वस्व डाल,
सब ही निश्चिंत-अभय हो।
हे पुण्य धरा के पुरुष! तुम्हारी...

जलती-तपती तृष्णा पर,
तुम सरस-स्नेह बरसाते।
बनकर प्रिय घनघोर घटा,
तन-मन सिंचित कर जाते।
पिय हिय में बसने वाले,
तुम प्रेरक प्रेम-मलय हो।
हे पुण्य धरा के पुरुष! तुम्हारी...

हिंसा या अतिरेक क्रोध का,
नहीं तुम्हारा भूषण।
अपशब्दों की भाषा करती,
व्यक्तित्वों का दूषण।
तुच्छ विचारों, भावों का
निज पौरुष में ही विलय हो।
हे पुण्य धरा के पुरुष! तुम्हारी...

इन अधरों को मुस्कान मिले,
तुम बिन क्या यह संभव?
जल बिन मीन विकल हो जैसे,
होता है यह अनुभव।
साथ तुम्हारा मिले,
ईश से यही सदा अनुनय हो।
हे पुण्य धरा के पुरुष! तुम्हारी...

- अभिलाषा सिंह 
     पटना, बिहार 


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