मोबाइल महिमा (व्यंग्यात्मक अवधी-हिंदी मिश्रित कविता) - चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

यंत्ररूप नारायण अवतारी, कलियुग माहि मोबाइल तनधारी।
जय हो सकल लोक के धर्ता, जय हो त्रिभुवन भुवन संचारी॥
तर्जनी संकेत तनिक-सा पावत, विद्युत गति तुरंत ही धावत।
निराकार साकार हो राजत, हिय महि धारत अउर धरावत॥
बिन समाधि दर्शन करवावत, विह्वल कर समाधि लगवावत।
हियतंत्री झंकृत कइके, ई भाँति-भाँति के राग सुनावत॥
सुसंस्कृत सुमानव भइलन, जे जन मोबाइल के धइलन।
अपावन, पावन भइलन, हृदय माहि जेहि धारन कइलन॥
जगती में मोबाइल व्यापत, मोबाइल में जगती ह व्यापत।
रंग-विरंग, कुरंग-सुरंग, सुरूप-कुरूप सबहि जन झलकावत॥
कलयुग शूर्पणखा नाम रखावत, नासा-कान बिना बिराजत।
लंक विलंक करि डंक बजावत, लंका जोरत आग लगावत॥
मनुपुत्रन के प्राण अधार, मोबाइल के महिमा ह अपरंपार।
जे जन चाहें आपन उद्धार, धारें मोबाइल चाहें रहे उधार॥
बिन पग चले, हजार पगी ई, बिन नयना देखहिं दृश्य अपार।
बिन कर करम करे करपति ई, कहलावे जग में ह करतार॥
बिन जिह्वा के अलख जगावत, पहुँचावत सत सागर पार।
बिन कानन के कर्णपति ई, सब कानन के करहिं सुतार॥
मोबाइल के सधले, जपले ही, हर प्रानी जइहैं वैतरणी पार।
अकिंचन त जपिहैं निसिदिन, आपहुँ राखी करतल सतबार॥
जे विरहिन चाहें आपन परिहार, मोबाइल ह उनकर उपचार।
हर पल हर क्षण के परिचारक, रात्रि-दिवस करत अभिसार॥
अगोचर बन जइहैं गोचर, मोबाइल के सेवकाई ह अपरिहार।
प्रियतम के धारीं अपने मन में, सुमधुर बातन करि संचार॥
रजत-कनक सम बहु मोलन, मोबाइल ह अनुपम उपहार।
हमरो ह एही इज़हार, अभिरामी मोबाइल के करीं प्रचार॥
हे! मोबाइल, ईश अवतारी, सकल ताप-हर, क्रंदन-उपचारी।
हे! दुखभंजन अजिरबिहारी, प्रणिपात करत हैं सब संसारी॥


— चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन" 
      गोरखपुर , उत्तर प्रदेश 

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