श्राद्ध-पक्ष आया तो घर फिर उदास हो गया,
जिसे खोया था कभी, वह चेहरा पास हो गया।
चूल्हे की आँच में माँ की ममता ढूँढ़ते हैं,
सूनी चौखट पर बाबुल की आहट सुनते हैं।
वह हाथ कहाँ हैं जो सिर पर दुआ रखते थे?
हम रोते थे तो चुपके से आँसू पोंछते थे।
आज थाली सजी है, मगर खाने वाला नहीं,
आँगन तो वही है, पर अब कोई बुलाने वाला नहीं।
तर्पण के जल में जब आँसू उतर जाते हैं,
बीते हुए रिश्ते सीने में फिर सँवर जाते हैं।
पिंड अर्पित करते हैं काँपते हुए हाथों से,
मन पूछता है— "क्यों बिछुड़े अपने इतनी जल्दी हमसे?"
कहते हैं पितर आशीष बनकर लौटते हैं,
शायद इसलिए दीपक आज भी उम्मीद से जलते हैं।
श्राद्ध केवल कर्म नहीं, टूटे मन की पुकार है,
जो चले गए, उनसे आज भी उतना ही प्यार है।
— अनीता मिश्रा सिद्धि
कालीकेत नगर, पटना