सूख रहीं
शाखाएँ
असमय,
अजर-अमर पेड़ की
केवल सौ साल।
पसंद थी हमें
घने पेड़ की छाया,
गाते थे एकल गीत।
अफ़सोस,
इस कालखंड में
हम ही नहीं भा रहे उसे।
हो सकता है
डरता हो पेड़
किसी अभाग्य से,
बार-बार
दिखाना चाहता है
अपनी पकड़
धरती से।
कोई समझाए,
सम्मान-समारोहों
से कहीं
हरी-भरी हुई हैं
शाखाएँ!
— प्रसाद रत्नेश्वर
मोतिहारी, बिहार