सपना में देखली (बाल कविता) - डॉ. सतीश चन्द्र भगत

रात में देखली सपना,
माई के भासा पढ़ली।
भासा के नाम बता दीं,
बज्जिका भासा पढ़ली।

समझ गेली ऊ कविता,
कथा-कहानी निम्मन से।
सच भेलई हम्मर सपना,
पढ़ली भासा निम्मन से।

समझे में अइलक माई,
ई भासा हई बज्जिका।
दादी, अम्मा, बाबू के,
बज्जिकांचल के बज्जिका।

हमहू बोलब, तुहू बोलऽ,
माई के सम्मान हए।
बोलऽ आ लिखऽ बज्जिका,
बोली-भासा शान हए।


— डॉ. सतीश चन्द्र भगत
07/10/2026
बनौली, दरभंगा - 847428

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