धन को नहीं भोगते हम, वह हमको भोग रहा (नवगीत) - हरिनारायण सिंह 'हरि'

अपने खातिर हमसे कितने तिकड़म करवाता,
हंस हुआ करता था, अब तो कौआ कहलाता।
छीन-छीन झोली भरने का सब दिन रोग रहा॥

पटना-दिल्ली अन्य शहर में महल हमारे हैं,
दौड़ रहे इस हित शहरों में, हम रखवाले हैं।
दिन ना चैन, रात ना निंदिया इनको जोग रहा॥

बेटे सब परदेश-देश में और विदेशों में,
और यहाँ हम धन की खातिर नित दिन केसों में।
नहीं सफल संतोष-शांति का यह उद्योग रहा॥


— हरिनारायण सिंह 'हरि'
      समस्तीपुर, बिहार 

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