हंस हुआ करता था, अब तो कौआ कहलाता।
छीन-छीन झोली भरने का सब दिन रोग रहा॥
पटना-दिल्ली अन्य शहर में महल हमारे हैं,
दौड़ रहे इस हित शहरों में, हम रखवाले हैं।
दिन ना चैन, रात ना निंदिया इनको जोग रहा॥
बेटे सब परदेश-देश में और विदेशों में,
और यहाँ हम धन की खातिर नित दिन केसों में।
नहीं सफल संतोष-शांति का यह उद्योग रहा॥
— हरिनारायण सिंह 'हरि'
समस्तीपुर, बिहार