हरड़ का पुराना पेड़ (छंदमुक्त) - रवींद्र कुमार शर्मा

घर के आँगन में है एक हरड़ का पेड़,
बड़ी-बड़ी हरड़ें लगती हैं बहुत दूर।
कई वर्षों से खड़ा एक कोने में,
गर्मियों में छाया देता है भरपूर।

सर्दियों में कर देते हैं उसकी छँटाई,
ताकि धूप आँगन में आ जाए।
पुराने पेड़ हो गए धीरे-धीरे ख़त्म,
हरियाली तभी बढ़ेगी जब कोई नए पौधे लगाए।

बुज़ुर्ग करते थे बहुत समझदारी का काम,
हरड़, बहेड़ा और आँवला तीनों हैं लगाए।
बनता है त्रिफला चूर्ण इन तीनों का,
हाज़मा हो जाए सही, पेट के रोगों से मुक्ति दिलाए।

कई पक्षियों का जमघट लगा रहता है उस पर,
चिड़ियाँ तो पूरा दिन चहक-चहककर शोर मचाती हैं।
दाना चुगने के लिए उतरती हैं आँगन में झुंड में,
अंदर से कोई निकलता है तो झट भाग जाती हैं।

शाम होते ही पक्षियों की सुनाई देती हैं आवाज़ें,
खाने के लिए मुँह खोलते चूज़े नज़र हैं आते।
पूरा दिन करते हैं इंतज़ार अपनी माँ का,
चीँ-चीँ की आवाज़ से पूरा वातावरण हैं गुँजाते।

अम्मा बैठी रहती हैं उस पेड़ के नीचे ब्यूह के ऊपर,
रहता है हमेशा उनका रास्ते से आने-जाने वालों पर ध्यान।
हर आने-जाने वाला करता है उनसे ख़ूब बातें,
पास आकर करते हैं बात, देते हैं सब बहुत इज़्ज़त-मान।

कभी जमघट लगा रहता था यहाँ इंसानों का,
आँगन भरा रहता था बच्चों और घरवालों से।
बुज़ुर्गों की दमदार आवाज़ें गूँजती थीं जहाँ,
आज दुखी हैं दरवाज़े, उन पर लटके बड़े-बड़े तालों से।

वीरान पड़ा है आँगन अब, लगे रहते हैं पत्तों के ढेर,
लगता है कभी-कभी जैसे देख रहा है दूर से आसमान।
जा रहे सब धीरे-धीरे, अपनी भी आएगी बारी एक दिन,
सामने कोई नहीं, बस दिखते हैं उनके क़दमों के निशान।


— रवींद्र कुमार शर्मा
घुमारवीं, जिला बिलासपुर (हि.प्र.)
चलभाष: ७०१८८५३८००

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