ज़िंदगी का सफ़र (आलेख) - गजानन पांडेय

ज़िंदगी दुख-सुख और धूप-छाँव का खेल है। रात के बाद दिन निकलता है—यह शाश्वत सत्य है। हँसी-खुशी है तो विदाई भी है। जीवन एक-सा नहीं रहता। परिवर्तन के साथ चुनौतियाँ भी आती हैं, जैसे फूलों के साथ काँटे भी होते हैं।
हम अपने विवेक, ज्ञान और समझ से हर परिस्थिति को अपने अनुकूल बना सकते हैं। यही समझदारी, अनुशासन और आत्मविश्वास हमें मुसीबतों का सामना करने की शक्ति देते हैं। यही गुण जीवन की जटिलताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा भी देते हैं।
साहिर लुधियानवी द्वारा फ़िल्म 'हम दोनों' के लिए लिखे गए गीत—“मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया”—में यही भाव व्यक्त किया गया है। जीवन को सही ढंग से जीना हमारे हाथ में है। हम इसे रोकर या हँसकर निभाते हैं—यह हम पर निर्भर है। क्या दुखी, निराश और हताश होकर बैठ जाने से परिस्थितियाँ सुधर सकती हैं? क्या उनमें कोई परिवर्तन आ सकता है? सच तो यह है कि जीवन संघर्ष का ही दूसरा नाम है।
ईश्वर ने हमें बुद्धि, बल, समझ और विवेक दिया है; इसलिए हमें रुकना नहीं है। “जो निरंतर चलते हैं, उन्हें ही मंज़िल मिलती है।” जीवन चलने का नाम है; रुक जाना जड़ता और पतन का संकेत है।
इस गीत में यही सीख दी गई है कि जीवन में जो मिल गया, उसे सहजता से स्वीकार कर लेना चाहिए। जो खो गया, उसे भुला देना ही बेहतर है। जो बीत गया, उस पर रोने से क्या लाभ?
गीत की ये पंक्तियाँ देखें—
“ग़म और ख़ुशी में फ़र्क न महसूस हो जहाँ,
मैं दिल को उस मुक़ाम पर लाता चला गया।”
यानी जीवन में संतुलन बनाए रखना, भावनाओं पर नियंत्रण रखना और जीवन को सही दिशा देना आवश्यक है। आत्मसंयम से ही जीवन में स्थिरता आती है।
“ये जीवन है, इस जीवन का यही है रंग-रूप,
थोड़े ग़म हैं, थोड़ी ख़ुशियाँ, यही है छाँव-धूप।”
“ये न सोचो इसमें अपनी हार है कि जीत है,
उसे अपना लो जो भी जीवन की रीत है।
यह ज़िद छोड़ो, मुँह न मोड़ो,
हर पल एक दर्पण है।”
(‘ये जीवन है’ — फ़िल्म: पिया का घर, गायक: किशोर कुमार)
अर्थात, जीवन को व्यवस्थित और सार्थक ढंग से जीना ही उसे अपने तथा दूसरों के लिए बेहतर बनाना है। जीवन को सतही तौर पर जी लेने का कोई अर्थ नहीं है। जीवन का मूल्य समझना आवश्यक है, ताकि हमारा आचरण दूसरों के लिए प्रेरणा बन सके।
सुख, शांति और समाज के लिए कुछ कर पाने की संतुष्टि का भाव ही हमें अपने परम लक्ष्य से जोड़ता है। इस शरीर को सफलता और मोक्ष की प्राप्ति का साधन बनाएँ—यही हम सबका ध्येय होना चाहिए।


- गजानन पांडेय

मकान नं. 2-4-1085

(पोस्ट) काचीगुड़ा, हैदराबाद-27

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