'भाषा बहता नीर'
हमारी हिंदी है,
तहज़ीबी तासीर
हमारी हिंदी है।
इसमें गंगा-जमुनी
संस्कृतियों की लय,
जन-मन की आशा,
अभिलाषा का संचय।
साखी-सबद-कबीर
हमारी हिंदी है।
अम्मा के आँचल का
दूध भरा इसमें,
आखर-आखर स्नेह-
सुमन पसरा इसमें।
हम सबकी तक़दीर
हमारी हिंदी है।
कोटि-कोटि कंठों की
वाणी यह भाषा,
अर्चन-वंदन, संवेदन
की परिभाषा।
स्वाभिमान-प्राचीर
हमारी हिंदी है।
इसमें ही अपनी
अस्मिता समाहित है,
सभी बोलियों के
स्वर-छंद प्रवाहित हैं।
चिंतन की तक़रीर
हमारी हिंदी है।
जीवन की, दर्शन की,
जन-जन की भाषा,
रही जोड़ने की ही
जिसकी अभिलाषा।
माँ! तेरी जागीर
हमारी हिंदी है।
- भगवती प्रसाद द्विवेदी
सर्जना, सृजनशील कॉलोनी,
बिस्कुट फ़ैक्ट्री रोड, निकट मगध आईटीआई,
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