14 सितंबर: हिंदी हमारा स्वाभिमान (आलेख) - मधूलिका श्रीवास्तव

आज हिंदी दिवस है, जो हमें हमारी मातृभाषा हिंदी की गौरवपूर्ण धरोहर की याद दिलाता है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिंदी दिवस केवल भाषा का उत्सव नहीं, बल्कि देश की विविधता में एकता का संदेश है। यह हमें जोड़ने का कार्य करती है।
हिंदी हमारी संस्कृति, परंपरा और साहित्य का दर्पण है। हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। लगभग 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते और समझते हैं।
संसार में जितनी भी विकसित सभ्यताएँ हैं, उनका मूल्यांकन उनकी भाषा की समृद्धि पर ही निर्भर करता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण संस्कृत भाषा है, जो आज भी संसार की किसी भी भाषा के मुक़ाबले ज़्यादा समृद्ध व अभिव्यक्ति में दक्ष है। हिंदी की जन्मदात्री भी वही है। हिंदी का समृद्ध व्याकरण-कोष है, जो अन्य भाषाओं में नहीं है। हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, जो वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत सरल और व्यवस्थित मानी जाती है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हम जो बोलते हैं, वही लिखते हैं। लिपि और उच्चारण एक होने से आज हिंदी विश्व स्तर पर सबसे शुद्ध व विज्ञान-सम्मत मानी जाने लगी है।
हिंदी एक बहुआयामी भाषा है, जिसमें एक ही भाव (मूड) के लिए विभिन्न शब्द हैं। जैसे—हँसना, खिलखिलाना, चहकना, क़हक़हे लगाना, ठहाके लगाना। आप सिर्फ़ एक शब्द से ही व्यक्ति के मनोभावों का अंदाज़ा लगा सकते हैं; वहीं अंग्रेज़ी में सिर्फ़ 'Happy' है, जिससे भाव का बस एक ही रूप दिखता है। हमारे यहाँ चाचा, मामा, मौसा, फ़ूफ़ा जैसे शब्दों का जो अपनापन है, वह अंग्रेज़ी में कहाँ! हिंदी एक समृद्ध भाषा है और अपने आप में परिपूर्ण है।
इसका एक और उदाहरण आपके चेहरे पर बरबस मुस्कुराहट ला देगा—
छू लो तो चरण,
अड़ा दो तो टाँग।
धँस जाए तो पैर,
फिसल जाए तो पाँव।
आगे बढ़ाना हो तो क़दम,
राह में चिह्न छोड़े तो पद।
प्रभु के हों तो पाद,
बाप की हो तो लात।
गधे की पड़े तो दुलत्ती,
घुँगहरू बाँध दो तो पग।
खाने के लिए टंगड़ी,
खेलने के लिए लंगड़ी...
अंग्रेज़ी में सिर्फ़ Leg।
आजकल विदेशों में भी इसका महत्व बढ़ता जा रहा है। वे लोग इसकी मधुरता से प्रभावित हो रहे हैं। हमारी हिंदी फ़िल्में वहाँ बहुत प्रचलित हैं। यहाँ तक कि वे लोग हमारे हिंदी गाने सीख रहे हैं और चैनलों पर होने वाली प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। हमारे देश के कई नेता भी वहाँ हिंदी में भाषण दे रहे हैं।
किंतु हमारे यहाँ हिंदी का स्थान अंग्रेज़ी लेती जा रही है। इसके लिए शिक्षा पद्धति में संतुलन की ज़रूरत है; क्योंकि भाषा की समृद्धि के साथ ही वह रोज़गार से भी जुड़ी होनी चाहिए। रोज़गार के अवसरों के लिए किसी को किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता, वे सार्वभौमिक हैं तथा रोज़गार की आवश्यकता हर किसी को है। अतः अन्य भाषाओं का ज्ञान होना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना कि अपनी मातृभाषा का; क्योंकि सिर्फ़ मातृभाषा के बल पर आप संसार नहीं जीत सकते। आजकल कुछ राज्यों में केवल स्थानीय भाषा पर ही अत्यधिक ज़ोर दिया जा रहा है, जो कि उचित नहीं है।
हमें राष्ट्रभाषा और मातृभाषा के अंतर को समझना होगा। हमारा देश बहुत विशाल है तथा यहाँ हर प्रांत की अपनी एक भाषा है; जैसे महाराष्ट्र की मराठी, तमिलनाडु की तमिल, तो बंगाल की बंगाली—ये सभी मातृभाषाएँ हैं जो प्रदेशों के क्षेत्र के आधार पर बँटी हुई हैं। वैसे हिंदी हमारी मातृभाषा के साथ-साथ संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में भी प्रतिष्ठित है। हर प्रांत की भाषा का सम्मान करते हुए हिंदी को पूरे देश में अनिवार्य रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
आज का यह दिवस हमें याद दिलाता है कि हमें हिंदी पर गर्व करना चाहिए और इसे न केवल पढ़ाई या कार्यक्रमों तक सीमित रखना चाहिए, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में अपनाना चाहिए।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम हिंदी का सम्मान करेंगे, उसका अधिक से अधिक प्रयोग करेंगे और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी हिंदी का महत्व बताएँगे।
अंत में मैं कहना चाहती हूँ कि संसार में स्वयं को साबित करने के लिए हमें कई भाषाएँ आनी चाहिए और हमें सभी का सम्मान करना चाहिए।


- मधूलिका श्रीवास्तव
ई-101/17, शिवाजी नगर,
भोपाल (म.प्र.) - 462016

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