मन की व्यथा: मुक्तक-षट्क - डॉ. नीलम श्रीवास्तव

1
कहीं आँखों में वहशत है, कहीं सीने में दहशत है,
अदावत है, बग़ावत है, फ़क़त दौलत की चाहत है।
शहर से गाँव तक फैला है यूँ शोला गुनाहों का,
झुलसती रूह इंसाँ की, यही अब तो सियासत है!
2
कब तलक? कब तलक? चुप रहें कब तलक?
मन से मन की व्यथा हम कहें कब तलक?
है झुलसता बदन, छटपटाता यह मन,
जुल्म की आग में हम दहें कब तलक?
3
कितने लाचार हो गए हैं हम,
मन से बीमार हो गए हैं हम!
तोड़ इंसानियत के धागों को,
सिर्फ़ बाज़ार हो गए हैं हम।
4
तेरे सुर में न सुर मिलाएँगे,
अब मुक़द्दर न आज़माएँगे।
आसमाँ में उड़ेंगे खोलके पर,
चाँद पर आशियाँ बनाएँगे!
5
बिछड़कर जो गए परदेस, अपनों से मिलेंगे कब?
हुए दंगे में जो बेघर, अधर उनके हिलेंगे कब?
डूबे जो दीनता के सिंधु में सदियों से हो बेबस,
सुमन उन शोषितों, दलितों के आँगन में खिलेंगे कब?
6
कितने अपने-पराए डगर में मिले,
खार के संग गुल भी डगर में मिले।
आ गए पा के दामन लिए दर पे हम,
पर छुपे सारे शैतान घर में मिले!


— डॉ. नीलम श्रीवास्तव
सीवान (बिहार)

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