मामा जी के पके बाल (लघुकथा) - डॉ. प्रीति सुमन

एक बार मैं और मेरे भैया मम्मी के साथ गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर गए हुए थे। दोपहर का वक्त था, मम्मी किसी काम से बाज़ार चली गईं और हम दोनों आँगन में अकेले ही मिट्टी-धूल से खेल रहे थे। तभी वहाँ हमारे बड़े मामाजी प्रकट हुए। मामाजी वैसे तो पूरे इलाके में अपनी 'खड़ूसियत' के लिए मशहूर थे, पर उस दुपहरिया उनके भीतर का शातिर दिमाग जाग गया। उन्होंने हम दोनों को अकेले खेलते देखा तो सोचा—क्यों न इस मुफ़्त की लेबर का फ़ायदा उठाया जाए!
मामाजी ने खटिया पर ढीले होते हुए एक बड़ा ही लुभावना ऑफ़र दिया, "देखो बच्चों, मैं सो रहा हूँ। अगर तुम दोनों मिलकर मेरे सिर से ढूंढ-ढूंढकर १०० पके (सफ़ेद) बाल निकाल दोगे, तो मैं तुम दोनों को सीतामढ़ी के सिनेमा हॉल में फ़िल्म दिखाने ले चलूँगा।"
उम्र तो यही कोई पाँच-छह साल की रही होगी, लेकिन फ़िल्म का क्रेज़ ज़बरदस्त था मुझे। सो, हम दोनों की आँखों में 'सिनेमा' का नाम सुनते ही तीन सौ वाट का बल्ब जल गया। भैया ने मुझे कोहनी मारी, "बड़ा मज़ा आएगा छोटी, चलो कर देते हैं।" मामा पर भरोसा तो रत्ती भर नहीं था, पर लालच क्या न कराए! हम दोनों मामाजी के सिर पर जूँ की तरह चिपक गए।
दिक्कत यह थी कि दोपहर की धूप में मामाजी के काले-घने बालों में सफ़ेद बाल ढूंढना सुई खोजने जैसा था। ऊपर से मुझे तो बाल उखाड़ना भी नहीं आता था, सो भैया को अकेले ही मशक्कत करनी पड़ रही थी। आधे घंटे की कड़ी मेहनत के बाद भी बमुश्किल १५-२० बाल ही जमा हो पाए। उँगलियाँ दुखने लगीं और हमारा धैर्य जवाब दे गया। १०० का आंकड़ा तो कोसों दूर था।
तभी भैया के खुराफ़ाती दिमाग में एक 'न्यूटन वाला आइडिया' आया। उन्होंने मुझसे फुसफुसाकर कहा, "छोटी, तुम बस दोनों हाथों से मामा के सिर में उँगलियाँ फेरती रहो ताकि उन्हें लगे हम काम में लगे हैं, मैं अभी आता हूँ।"
भैया दबे पाँव भागे और नानी के पड़ोसी के खूंटे से बँधी बकरी के पास पहुँच गए। बकरी बेचारी समझ ही नहीं पाई कि यह छोटा-सा इंसान उसकी पीठ पर क्या ढूँढ रहा है! भैया ने 'मैं-मैं' करती बकरी की पीठ से जल्दी - जल्दी कुछ सफ़ेद बाल उखाड़ लिए और मामाजी और पड़ोसी को बिना भनक लगे हवा की रफ़्तार से वापस आ गए। उन्होंने उसको मामा जी के उखाड़े हुए असली बालों में मिलाकर गिना, "लीजिए मामाजी, पूरे २५ हो गए!"
मामाजी तो नींद के आगोश में थे, उन्हें क्या पता कि उनके सिर पर इंसानी उँगलियाँ घूम रही हैं और नीचे ढेर बकरी के बालों का लग रहा है! जब आसान रास्ता मिल जाए, तो भला कौन मेहनत करता है? अब यह हमारा परमानेंट सिस्टम बन गया। मैं झूठ-मूठ मामाजी का सिर सहलाती रही और भैया बार-बार जाकर बेचारी बकरी का 'मुंडन' करते रहे। देखते ही देखते, तकिया के बगल में पूरे १०० सफ़ेद बालों की ढेरी लग गई।
शाम को जब मामाजी सोकर उठे, तो हमने गर्व से छाती फुलाकर कहा, "देखिए मामाजी! पूरे १०० पके बाल तोड़ दिए।" मामाजी ने अलसाई आँखों से ढेरी देखी और बोले, "हूँ... ठीक है।"
हमने तुरंत अपना हक माँगा, "अब वादा पूरा करिए, फ़िल्म दिखाइए!" मामाजी टालते हुए बोले, "हाँ-हाँ, किसी दिन दिखा दूँगा।"
एक दिन बीता, दो दिन बीते, पर मामाजी तो एकदम सब भूल-भालकर बैठ गए। आखिरकार तीसरे दिन हमने हिम्मत जुटाई और मामाजी के सामने जाकर डट गए, "मामाजी, चलिए फ़िल्म दिखाने!"
इतना सुनना था कि खड़ूस मामाजी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने 'तड़ातड़' हम दोनों के गाल पर एक-एक थप्पड़ रसीद किया और दहाड़े, "भागो यहाँ से! दिमाग खराब करके रखा है दोनों ने। फ़िल्म की स्पेलिंग भी आती है? इतने-इतने से पिद्दी टॉकीज़ में फ़िल्म देखेंगे? जाओ, भागो यहाँ से, जाकर पढ़ाई करो!"
मामाजी की उस दहाड़ से हमारी सारी चालाकी धरी की धरी रह गई। गाल सहलाते हुए जब हम वहाँ से भागे, तो भारी निराशा हुई कि इतनी मेहनत भी की, बेचारी बकरी भी मुफ़्त में हमारा शिकार हुई और फ़िल्म भी देखने नहीं मिली।
लेकिन आज जब भी यह वाकया सोचती हूँ, तो हँसी नहीं रुकती कि खड़ूस मामाजी जिस सफ़ेद बालों की ढेरी को देखकर खुश हो रहे थे, वह मामा जी के पके बाल नहीं, असल में बकरी के बाल थे!


- डॉ. प्रीति सुमन 
सीतामढ़ी, बिहार 

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