प्रश्न बहुत हैं परमेश्वर तुमसे,
क्या तुम उत्तर दे पाओगे?
या अपनी लीलाओं की भाँति,
बस इधर-उधर भटकाओगे?
जो भी पिता है इस धरती पर,
समदृष्टि ही संतानों पर रखता है;
जगती के परमपिता तुम, फिर भी
भेद करते हो, क्यों ऐसा लगता है?
किसी को धरा के सब सुख दे डाले,
लथपथ कोई पीड़ा के आघातों से;
यह मानव-मन तुम्हें पूजे फिर कैसे,
भेद भरे तुम्हारे ऐसे व्यवहारों से?
कभी कहोगे, सब कर्मों का फल है,
कभी कह दोगे, भाग्य अटल है;
जब तुम्हीं रचते हो भाग्य-कर्म को,
यह तर्क तुम्हारा फिर तो छल है!
शायद तुम उत्तर न देना चाहो,
तो क्या प्रश्न पूछना भी छोड़ दें?
न सुनो हमारी आर्त-वाणी तुम तो,
तुम्हें पुकारना भी क्या हम छोड़ दें?
— डॉ. राम प्रमोद मिश्र
एल्डिको उद्यान, 210, सुरक्षा-2,
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