गज्जू बाबा से पूछलक— "तनी बताबऽ हमरा कि 'अँगना सूख्खल बरसे पानी' के मतलब कथी भेलई?"
"ई समझ कऽ कथी करबऽ?"— बाबा कहलथिन।
"बाँकी एक्कर मतलब बहुत्ते गूढ़ हए। ई कबीर साहब के उलटबांसी हए। ग्यानी लोग उपदेश के झरी लगबइत हए। नऽ समझे वाला के लेल निम्मन बातों समझ से बाहर हो जाएत।"
"समझ में आ गेलो?"— बाबा पूछलथिन।
"बहुत्ते निम्मन! बाँकी एक्कर मतलब केतनो माथा लगा कऽ देखइत रही, तऽ नऽ अइलक!"— गज्जू कहलक।
"ई एक तरह से बरका बदलाव हए। पहिले पैर धरती में आ माथा ऊपर के ओर, आ अब माथा नीच्चा में आ पैर असमान में। बरका फेर हए हो बाबा!"— गज्जू बोललक।
तब नऽ समझे वाला लोग कहइत हतन कि— "अँगना सूख्खल बरसे पानी!"
— डॉ. सतीश चन्द्र भगत
दरभंगा, बिहार