अँगना सूख्खल बरसे पान ( बज्जिका लघुकथा) — डॉ. सतीश चन्द्र भगत

गज्जू बाबा से पूछलक— "तनी बताबऽ हमरा कि 'अँगना सूख्खल बरसे पानी' के मतलब कथी भेलई?"
"ई समझ कऽ कथी करबऽ?"— बाबा कहलथिन।
"बाँकी एक्कर मतलब बहुत्ते गूढ़ हए। ई कबीर साहब के उलटबांसी हए। ग्यानी लोग उपदेश के झरी लगबइत हए। नऽ समझे वाला के लेल निम्मन बातों समझ से बाहर हो जाएत।"
"समझ में आ गेलो?"— बाबा पूछलथिन।
"बहुत्ते निम्मन! बाँकी एक्कर मतलब केतनो माथा लगा कऽ देखइत रही, तऽ नऽ अइलक!"— गज्जू कहलक।
"ई एक तरह से बरका बदलाव हए। पहिले पैर धरती में आ माथा ऊपर के ओर, आ अब माथा नीच्चा में आ पैर असमान में। बरका फेर हए हो बाबा!"— गज्जू बोललक।
तब नऽ समझे वाला लोग कहइत हतन कि— "अँगना सूख्खल बरसे पानी!"


— डॉ. सतीश चन्द्र भगत
       दरभंगा, बिहार 

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