सोहर, समदन, बिरहा गाना भूल गए,
चक्रव्यूह में फँस मुस्काना भूल गए।
पहले पंछी मुक्त गगन में उड़ते थे,
पिंजड़े में अब पंख चलाना भूल गए।
क़दम-क़दम पर आज महाभारत का रण,
अब तो वंशी मधुर बजाना भूल गए।
कौरव-पांडव मिले, कृष्ण एकाकी हैं,
अब गीता का पाठ सुनाना भूल गए।
कंस-जरासंधों से घिरा हुआ जीवन,
अब तो सुख के साज सजाना भूल गए।
जो भी मिलते, मतलब के हैं मीत यहाँ,
गला काटते—गले लगाना भूल गए।
क़दम-क़दम पर, 'अर्जुन', टूटे ख़्वाब यहाँ,
इसीलिए अब ख़्वाब सजाना भूल गए!
— अर्जुन प्रभात