चक्रव्यूह में फँस मुस्काना भूल गए(कविता) - अर्जुन प्रभात

सोहर, समदन, बिरहा गाना भूल गए,
चक्रव्यूह में फँस मुस्काना भूल गए।

पहले पंछी मुक्त गगन में उड़ते थे,
पिंजड़े में अब पंख चलाना भूल गए।

क़दम-क़दम पर आज महाभारत का रण,
अब तो वंशी मधुर बजाना भूल गए।

कौरव-पांडव मिले, कृष्ण एकाकी हैं,
अब गीता का पाठ सुनाना भूल गए।

कंस-जरासंधों से घिरा हुआ जीवन,
अब तो सुख के साज सजाना भूल गए।

जो भी मिलते, मतलब के हैं मीत यहाँ,
गला काटते—गले लगाना भूल गए।

क़दम-क़दम पर, 'अर्जुन', टूटे ख़्वाब यहाँ,
इसीलिए अब ख़्वाब सजाना भूल गए!


— अर्जुन प्रभात

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