ताश के पत्ते (कविता) - चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

हैं ताश के बावन पत्ते, ये सबके सब हरजाई,
कोई हारे या फिर जीते, सब बोलें राम-दुहाई।

पातशाह है इक्का पहले, फिर बादशाह है आता,
खल्क़ ख़ुदा का, मुल्क शाह का, है यह याद दिलाता।

बेगम भी जब बने पतुरिया, हर हाथों में जाए,
नौकरशाही-सा रंग जमाता, है ग़ुलाम इतराए।

दहला दे जो रण में सबको, वह दहला कहलाए,
कभी बजाता नौबत नहला, या नौबत करवाए।

अट्टहास करवाए अट्ठा, या जग में हेठी करवाए,
मौका पाकर सत्ता भी, शतरंगी चाल दिखाए।

रहे चतुर यदि पत्तेबाज़ी में, छक्का छक्के छुड़ाए,
या फिर प्रतिद्वंद्वी से मिलकर, पंजा हाथ मिलाए।

तिकड़ी चौक पुरावे चौके से, तिकड़म जो लग जाए,
है दुग्गी धौंस जमाए आँखों से, इक्का को फेंकवाए।

अजब खेल है पत्तेबाज़ी, शकुनि को लाज लजाए,
जोकर जो मिल जाए तो यह, फ़ौरन वीटो लगवाए।


- चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"
    चलभाष: ९३०५९८८२५२

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