बोले पे सॉंच आज मनाही बहुत हय
इहमा त झूठ के ही गवाही बहुत हय
चारों तरफ शोर गीत कीर्तन के हो रहल
कलयुग में संत जन के तबाही बहुत हय
चिंतन -मनन से काम न अब केकरो रहल
बस वाह वाही के ही उगाही बहुत हय
बेटी के आबरू भी बचाना मुहाल अब
बाकी बहाल अब भी सिपाही बहुत हय
खा गेल जे ज़मीर भी अप्पन बेच के
फेंके उहे तपाक सियाही बहुत हय
कइसे केकरो पे भरोसा हो केकरो
छन्न से छनकइत जे कराही बहुत हय
कर के विरोध झूठ के की होई 'साधना'
जहां के लोग बाग इलाही बहुत हय
- साधना कृष्ण
हाजीपुर, बिहार