"मिलॉर्ड! दामिनी के तलाक़ की अर्ज़ी को ख़ारिज कर दिया जाए। इसका पति इसे अभी भी साथ रखने को तैयार है। अगली तारीख़ पर आपके आदेशानुसार जब इनके दस वर्षीय पुत्र को अदालत में पेश किया गया, तो उसने स्पष्ट कह दिया कि वह मम्मी या पापा किसी के साथ रहना नहीं चाहता। एक बालिग-नाबालिग लड़के के भविष्य का सवाल है।"
"— योर ऑनर! योर पॉइंट इज़ करेक्ट, पर औरत को ऐलिमनी का अधिकार तो है।"
"— माई लॉर्ड! दस साल तक सब ठीक था। इसका पति जब व्यापार में व्यस्त हो गया, तो उसके पार्टनर से नैन-मटक्का का खेल खेलने लगी। उसका ख़ामियाज़ा बेटा क्यों भुगते? आजकल ऐसा ट्रेंड चल गया है कि पैसे वाले पति से ऐलिमनी ले लो और गुलछर्रे उड़ाओ। महिलाएँ क़ानून का दुरुपयोग कर रही हैं और पति बेचारा बनता जा रहा है। कहीं-न-कहीं क़ानून को इस पर रोक लगानी पड़ेगी, वरना तलाक़शुदा लोगों का एक अलग ही शहर बस जाएगा। अगर परिवार, समाज या देश बिखरता है, तो क़ानून को कुछ सोचना पड़ेगा। क़ानून में संशोधन लाना ही पड़ेगा। अदालत का दायित्व बहुत विशाल होता है।"
तब पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया। दलील के समक्ष धाराएँ कमज़ोर नज़र आने लगीं। न्यायमूर्ति की जोड़ी मीमांसा पर मजबूर हो गई। आपसी सलाह-मशविरे के बाद निर्णय सुनाया गया— "नाबालिग बच्चे की सुरक्षा हेतु अदालत यह आदेश देती है कि लड़के को बोर्डिंग में भेज दिया जाए, जिसका ख़र्चा माँ-बाप दोनों को वहन करना पड़ेगा। पति-पत्नी साथ रहें या अलग, बच्चे के बालिग होने के बाद ही तलाक़ पर फ़ैसला होगा। पाँच जजों की बेंच क़ानूनी धाराओं के बीच कोई अच्छी संभावना तलाश करेगी, ताकि अमरबेल की तरह फलती-फूलती तलाक़ की प्रक्रिया को रोका जा सके।"
- सेवा सदन प्रसाद
मुम्बई, महाराष्ट्र