जो भी मेरे पथ पर आएगा,
जो भी मेरे पथ पर काँटे बिछाएगा—
हाँ, जो भी मुझे आगे बढ़ने से रोकेगा...
मैं उसे तलवार से नहीं,
मीठे शब्दों से हराऊँगा!
एक बार नहीं—
बार-बार समझाऊँगा,
हर बार उसे अपनाऊँगा!
मित्रता का हाथ बढ़ाऊँगा,
मित्रता का पाठ पढ़ाऊँगा,
और सुनाऊँगा उसे वह अमर कथा—
जहाँ शत्रु भी मित्र बन जाते हैं!
हाँ!
मैं शत्रु को मित्र बनाऊँगा,
उसे साथ लेकर आगे बढ़ जाऊँगा—
और तब…
तब उसे भी समझ में आएगी,
मित्रता की असली ताक़त!
किसी की राह में काँटे बिछाना—
यह कैसा धर्म है?
दूसरों के लिए गड्ढे खोदने वालों,
याद रखना—
सबसे पहले उसी में तुम गिरोगे!
मैं उसे यह सच्चाई भी बताऊँगा!
क्षमा…
क्षमा कमज़ोरी नहीं होती—
क्षमा ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है!
क्षमा ही आगे बढ़ने की असली गति है!
मधुर शब्द—
जीवन का संगीत रचते हैं,
और कटु वचन…
बनती हुई बात भी बिगाड़ देते हैं!
यह भी मैं उसे सिखाऊँगा!
गिरे हुए को उठाना,
उसे गले लगाना—
उसे अपना ही एक हिस्सा मान लेना…
यही तो इंसानियत है!
जब अपनापन मिलता है,
तो हर अंग पुलकित हो उठता है—
यह एहसास भी मैं उसे दिलाऊँगा!
जो ज्ञान मेरे पास है—
अक्षर-अक्षर बाँट दूँगा!
निरर्थक शब्दों से दूर रहूँगा,
और उसे भी यही राह दिखाऊँगा!
मैं उसे उस दुनिया में ले जाऊँगा—
जहाँ अज्ञान को ज्ञान मिलता है,
जहाँ छोटे को प्यार,
और बड़े को सम्मान मिलता है!
जहाँ शोर नहीं—संस्कार बोलते हैं,
जहाँ धर्म नहीं—मानवता पलती है!
जहाँ ख़ून की प्यास नहीं,
प्रेम की गंगा बहती है!
जहाँ सत्य की शपथ ली जाती है,
जहाँ प्रेम के गीत गाए जाते हैं,
जहाँ रिश्ते टूटते नहीं—
और कोई भी डरता नहीं!
हाँ!
वहीं ले जाऊँगा मैं उसे—
लेकिन…
केवल तब…
जब वह मेरे शब्दों को नहीं,
मेरे भावों को समझ पाएगा!
- तेज नारायण राय
दुमका (झारखंड)
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कविता