प्यार उठा कर लाए हो मयख़ाने में
और वफ़ा तुम ढूँढ रहे पैमाने में
इतना ज़ुल्म किया है दुनिया वालों ने
क्या लज़्ज़त बाक़ी रहती दीवाने में
ज़ख़्म हरा करते हो याद दिला कर रोज़
तुमको क्या मिलता है मुझे रुलाने में
गाँव में बीता बचपन जब याद आता है
रो देता हूँ ऑफ़िस से घर जाने में
बज़्म की रौनक़ देख के 'बन्धु' घबराए
रहने की आदत उनको वीराने में
— अविनाश 'बन्धु'
पटना, बिहार