सत्यनारायण हिंदी के महत्त्वपूर्ण गीतकार हैं। बिहार का राज्य-गीत उनके द्वारा रचा गया है—
'मेरे भारत के कंठहार
तुझको शत-शत वंदन बिहार'
यह वह गीत है, जो हमारी विरासत और गौरव को दर्शाता है। इसमें हमारे देश की आत्मा बसती है। सचमुच, इस गीत में राज्य की जो गाथा है और जैसी संस्कृति इसमें झलकती है, वैसा गीत लिखना सिर्फ़ कवि सत्यनारायण के ही वश की बात थी।
कवि सत्यनारायण को मैंने बहुत सुना और पढ़ा है। कई बार कवि-सम्मेलनों में उनके संचालन में उन्हें सुनने और पढ़ने का मौक़ा मिला है। बेगूसराय के गोदरगांवां के एक कवि-सम्मेलन में मैं आमंत्रित नहीं था, लेकिन लगभग पच्चीस किलोमीटर की दूरी तय करके मैं सिर्फ़ इसलिए सुनने पहुँचा था कि उस कवि-सम्मेलन का संचालन सत्यनारायण कर रहे थे। असल में उनकी आवाज़ में एक जादू है, एक कशिश है, एक ऐसा आकर्षण है जो सहसा किसी को अपनी ओर खींच लेता है। उनके पास शब्दों का अक्षय भंडार है; और जिस शब्द का वे इस्तेमाल करते हैं, मानो वे शब्द उनके इशारों पर नाचते फिरते हैं। उनकी आवाज़ में एक दर्द है, एक संवेदना है, एक ऐसी टीस है जो श्रोता को भाव-विभोर कर देती है। उनका व्यक्तित्व इतना विराट है कि आप उन्हें किसी महफ़िल में छिपाकर नहीं रख सकते—जैसे कोई ख़ुशबू या किसी चराग़ को क़ैद नहीं किया जा सकता। उनके विराट व्यक्तित्व की झलक निराला, दिनकर और जानकीवल्लभ शास्त्री में मिलती है।
13 सितंबर 1935 को ग्राम कौलोडिहरी (भोजपुर) में जन्मे सत्यनारायण प्रसाद उर्फ़ सत्यनारायण, इतिहास में स्नातकोत्तर करने के बाद 1993 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए। उन्हें बिहार सरकार ने 2020-21 में 'नागार्जुन सम्मान' से सम्मानित किया था। भारत सरकार द्वारा वर्ष 2023 में उन्हें 'भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार' प्राप्त हुआ। वे विश्व हिंदी सम्मेलन के सिलसिले में दक्षिण अफ़्रीका भी गए। उन्होंने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के 'कुलगीत' की रचना की। उनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं; जिनमें 'तुम ना नहीं कर सकते' और 'सुनें प्रजाजन' उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं, वहीं 'टूटते जलबिंब' तथा 'सभाध्यक्ष हंस रहा है' उनके गीतों के संग्रह हैं। यह बात कम ही लोग जानते हैं कि जेपी आंदोलन में उनकी महती भूमिका रही। उन्होंने सैकड़ों नुक्कड़-गीत लिखे जो चौक-चौराहों पर गाए गए। इन गीतों ने आंदोलन को एक नई दिशा दी, यहाँ तक कि वे 'जेपी आंदोलन के कवि' कहकर पुकारे जाने लगे। उनका स्वभाव कुछ ऐसा रहा कि उन्होंने कभी स्वयं को विज्ञापित (प्रमोट) नहीं किया। पटना के एक कवि-सम्मेलन में जब संचालक ने उनके बारे में कुछ बातें बताईं, तो कवि सत्यनारायण ने कविता-पाठ करने से पहले कहा— "कभी भी कवि को नहीं, कविता को बोलने देना चाहिए।"
हिंदी साहित्य में नवगीत की जो परंपरा विकसित हुई, सत्यनारायण उस आंदोलन के प्रमुख संवाहकों में से थे। नवगीत स्वतंत्र भारत के मोहभंग की स्थिति का एक गेय काव्य-रूप है, जिसने परंपरागत भाषा, घिसे-पिटे छंद, पुराने हो चुके प्रतीक और धूमिल बिंबों की जगह नए तौर-तरीक़ों से मनुष्य के जीवन-यथार्थ और अनुभूतियों को अभिव्यक्त किया।
सत्यनारायण के गीत महज़ काग़ज़ की शोभा बनकर नहीं रहे, बल्कि वे एक आंदोलन बनकर उभरे। उनके गीतों ने विशेषकर जेपी आंदोलन के समय एक क्रांति पैदा की। अपने समय के तमाम आलोचकों ने सत्यनारायण की गीत-रचनाओं की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। गीतकार नचिकेता ने कहा था— "सत्यनारायण की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण इनकी प्रखर सामाजिक चेतना तथा समसामयिक राजनीति का गहरा बोध है।" प्रसिद्ध आलोचक नंदकिशोर नवल का मानना है कि अपनी नुक्कड़-कविताओं में वे साधारण जनता के बीच से उभरे हुए एक ऐसे साधारण कवि हैं, जो दुर्लभ वैशिष्ट्य से युक्त हैं। लेनिन ने लिखा है कि— "जब तुम्हारे विचार उलझे हुए लगें तो जनता के पास जाओ, वे सुलझ जाएँगे।" सत्यनारायण की कविता इसका साक्षात प्रमाण है। जाने-माने साहित्यकार विद्याभूषण का मानना है कि— "कथ्य की जितनी इंद्रधनुषी विविधता सत्यनारायण जी के नए-पुराने गीतों में है, उससे इस कवि के क़द की ऊँचाई स्वमेव ऊपर उठ जाती है।"
सत्यनारायण के कई गीत लोगों की ज़बान पर रचे-बसे हैं। इसकी वजह यह है कि ये गीत गाँव, सड़क और चौराहों की नुक्कड़-सभाओं में गाए गए हैं। गीतों की लय (तर्ज़) भी कुछ ऐसी है कि वह स्वयं ज़बान पर चढ़ जाती है—
बंदी होगा, धरना होगा
जो भी होगा, करना होगा।
ठठरी देह, पेट ख़ाली है
बदहाली पर बदहाली है,
उनको देखो, उनकी हमदम
होती होली-दिवाली है।
इन सफ़ेदपोशों से अब तो
सब हिसाब करना होगा।
असल में सत्यनारायण के गीतों में भारत की आत्मा बसती है, इसीलिए उन्होंने गीत को महज़ गाने के लिए नहीं, बल्कि क्रांति लाने के लिए रचा है—ठीक वैसे ही जैसे दुष्यंत कुमार ने गज़ल को इंकलाब का माध्यम बनाया था। आग की बात दुष्यंत भी करते हैं और सत्यनारायण भी; दोनों के यहाँ 'आग' विरोध, बगावत और क्रांति का प्रतीक है—
अभी अँधेरा गया नहीं है
हो पाया कुछ नया नहीं है,
जलने दो, हाँ जलने दो
आग साथियों! पलने दो।
एक ऐसे समय में जब सत्ता के ख़िलाफ़ बोलना कठिन था, वर्ष 1977 में सत्यनारायण ने साहस के साथ एक गीत की रचना की और लोगों का आह्वान किया—
हो जाओ तैयार साथियों, अभी नहीं तो कभी नहीं!
ऐसा चला जुलूस का चक्कर
हम-तुम सब हैं हक्का-बक्का,
अबकी रहे इरादा पक्का
छोड़ो पिछला पंजा-छक्का।
करो वोट से वार साथियों, अभी नहीं तो कभी नहीं!
यह गीत उनकी पुस्तक 'सुनें प्रजाजन' में संकलित है। ऐसा नहीं है कि यह उनका अकेला गीत है; उन्होंने इस प्रकार के अनगिनत गीत लिखकर तत्कालीन सत्ता के अत्याचारों के विरुद्ध एक वातावरण निर्मित किया था—
सन सतहत्तर की ललकार
दिल्ली में जनता सरकार!
फिर वे इतने पर ही नहीं रुके, आगे की पंक्तियों में उन्होंने राजनीतिक विसंगतियों को उघाड़कर रख दिया—
भैया सुन लो पक्की बात
कांग्रेस हाथी का दाँत,
इसकी आँतड़ी बावन हाथ
गिरगिट का अड्डा है यार!
उनके गीत राजनीति में फैली गंदगी को जनता के सामने लाकर उसे साफ़ करने का कार्य करते हैं। यूँ ही नवगीत को 'खुली कविता' की संज्ञा नहीं दी गई है। ज़ाहिर है, सत्यनारायण के गीतों के कथ्य उलझे हुए नहीं होते; वे साफ़गोई से अपनी बात कहते हैं—
देखो नया तमाशा देखो
राजनीति के नील गगन में
यह रंगीन कुहासा देखो।
ऐसा भी नहीं है कि डरी-सहमी जनता की मनोदशा का उन्हें भान नहीं था, वरना वे ऐसा न कह पाते—
भीतर संशय, बाहर भय है
दबे पाँव चल रहा समय है।
आलोचक डॉ. राजेश सिंह ने माना है कि— "मानव को भय, अभाव और अन्याय से मुक्त कराना ही नवगीतकार का महत्तम उद्देश्य है।" सत्यनारायण भी इन्हीं उद्देश्यों को लेकर चलने वाले गीतकार हैं। वे हर हाल में आगे बढ़ने का संदेश देते हैं—
पंछी की कब रुकी उड़ानें
घात लगाकर भले शिकारी
साध रहे हों लाख निशाना।
सत्यनारायण की दृष्टि केवल राजनीतिक घटनाक्रमों तक ही सीमित नहीं रही; उनके गीत जीवन के हर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहाँ प्रकृति भी है, गाँव-शहर भी हैं, सही-ग़लत का फ़ैसला करती अदालतें भी हैं और मासूम लोगों के लिए बनी क़त्लगाहें भी—
आँख पर
पट्टी चढ़ाए
बेख़बर मुंसिफ़-अदालत,
गाँव-बस्ती
शहर-कस्बा
हर तरफ़ हैं क़त्लगाहें।
कवि सत्यनारायण ने कई ग़ज़लें भी लिखीं। यह अलग बात है कि उनके 'गीतकार' रूप के आगे उनका 'ग़ज़लकार' रूप थोड़ा ओझल हो गया, इसलिए उनकी ग़ज़लों की चर्चा कम होती है। असल में उनकी ग़ज़लों का भी वही तेवर है जो दुष्यंत की शायरी में दिखता है। वे अपनी ग़ज़लों में भी केवल हुस्न-ओ-इश्क़ की बातें नहीं करते, बल्कि उनमें भी क्रांति के बीज बोते हैं। उनकी ग़ज़लों के कुछ शेर द्रष्टव्य हैं—
फिर चराग़ों से धुआँ उठने लगा, कुछ कीजिए
अब तो इस घर में भी दम घुटने लगा, कुछ कीजिए।
रात का आलम अगर होता तो कोई बात थी
दिन निकलते आदमी लुटने लगा, कुछ कीजिए।
ठीक इसी तरह 'जनता सरकार' की कार्यशैली पर भी उन्होंने ग़ज़लें कही थीं। एक-दो शेर मुलाहज़ा कीजिए—
बुझ गए हैं दिन के सब मंज़र कि शाम आने को है
रहगुज़र में अब अँधेरों का मुक़ाम आने को है।
आँधियों का नाम लेकर फूल रौंदे जाएँगे
दोस्तों! अब तो चमन में वह निज़ाम आने को है।
वस्तुतः कवि सत्यनारायण के साहित्य का फलक अत्यंत विस्तृत है। उन्होंने नवगीत को प्रतिष्ठा दिलाई और उसके माध्यम से एक इंकलाब खड़ा किया तथा गीतों को चाहने वाली जनता की एक नई शृंखला तैयार की। भले ही आज वे हमारे बीच नहीं हैं, किंतु बिहार की इस पावन माटी को हमेशा इस बात पर फ़ख़्र रहेगा कि उनका संबंध इसी धरती से था।
—डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री
बेगूसराय, बिहार
बहुत ही शानदार लिखा है आपने 👌🏻👌🏻
जवाब देंहटाएं