द्वारपाल (कविता) - संजय पवार

प्यार बहुत मुझसे करता है,
मेरा हरसिंगार रोज़ बरसता है।
पवन से अठखेलियाँ खेलता,
मेरा इंतज़ार करता रहता है।

शाम से ही पवन को महकाए,
हौले-हौले हिमकण बरसाए।
मैं मिलूँ तो मुझे भी बहकाए,
घर-आँगन को फूलों से सजाए।

भोर हुए जब उससे मिलता हूँ,
संग उसके मैं भी खिलता हूँ।
वह मुझसे पूछे, मैं उससे पूछूँ,
वह हँसता है, मैं भी हँसता हूँ।

सिर, बदन पर फूल बरसाता है,
हमारी यारी को दृढ़ बनाता है।
वह रह नहीं पाता है मेरे बिना,
मुझे चैन न आता उसके बिना।

प्रकृति-देवी का यह कमाल है,
हरसिंगार मेरा हरा-भरा, मालामाल है।
चारों दिशाओं को महकाता,
लगता जैसे स्वर्ग का द्वारपाल है।


— संजय पवार
   पुणे, महाराष्ट्र 


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