जीवन देने वालों पर जब अत्याचार घिनौने हों।
राजतंत्र या प्रजातंत्र के शासक इतने बौने हों।
राजकुमारी, रानी, दासी, सबके आगे एक लकीर,
आगे देश सुरक्षित न हो, तो कैसी होगी तस्वीर!
जौहर करने हेतु वीरता सज-धजकर तैयार हुई,
मृत्यु स्वयं वरण करने को क्षत्राणी तैयार हुई।
कुत्सित व कुकर्मी के हाथों जीवन क्यों देना है,
अपनी अस्मिता अपना गौरव, यूँ हरगिज़ न खोना है।
जौहर अंतिम अस्त्र-शस्त्र था, वीरगति को पाने का।
यही समय था देश की ख़ातिर हँसते हुए मिट जाने का।
उस पर अगर प्रश्न हैं उठते, उत्तर सही यही होगा,
भारत की सीमा-रेखा पर कोई तर्क नहीं होगा।
— टी. के. पाण्डेय