सुबह के सात बजे थे। हल्के बादलों के साथ बहती ठंडी हवाएँ मन को और तरो-ताज़ा कर रही थीं। मैं अपने बालकनी-नुमा बगीचे में ब्रश करते हुए टहल रही थी। तभी फोन की घंटी बज उठी—'एक प्यार का नगमा है...'
“हेलो छुटकी! बुआ की तबीयत थोड़ी ज़्यादा ख़राब हो गई है, चलेगी देखने?”
“हाँ, पर हुआ क्या...?”
“ओके, आता हूँ!” और फोन कट गया।
कहीं जाना हो तो आजकल प्रेम और अपनेपन से ज़्यादा लोग उपहारों के इंतज़ाम पर ध्यान देते हैं। विशेषकर तब, जब आप उस घर में जा रहे हों जहाँ आपकी इज़्ज़त आपकी जेब या आपके लाए हुए गिफ्ट तय करते हैं।
मैंने जब फूफा जी को बुआ के पैर दबाते देखा तो अचानक घबरा-सी गई; क्योंकि ये वही फूफा जी थे, जो बुआ को 'पगली' और 'भीखमंगिन' के नाम से ही बुलाते थे। फूफा जी को लगता था कि दुनिया की सारी अमीरी उन्हीं के पास है और हम लोग सड़क छाप हैं, जिन्हें न ब्रांड का पता है और न ही रहन-सहन की शैली का। कभी-कभार बुआ को कुछ दिला देते, तो सौ बातें सुनाना नहीं भूलते थे कि वह किस गटर से आई हैं और अब उन्हें कितना कुछ देखने को मिल रहा है। माँ तो यह भी बताती हैं कि यदि कभी बुआ को लेकर बाहर जाना पड़ता था, तो फूफा जी उनसे कोसों दूर चलते थे। और यदि कोई उनकी पहचान का मिल जाए, तब तो बुआ दुनिया की सबसे कमअक्ल, गँवार, ओल्ड-फैशन और न जाने क्या-क्या हो जाती थीं! ख़ैर, गटर कितना ही गंदा क्यों न हो, खुद को स्वच्छ समझने वाला पानी कभी न कभी उसमें मिल ही जाता है।
मैंने भाभी से पूछा कि यह क्या चमत्कार है आज? भाभी मुस्कराहट के लहजे में बोलीं, “जब से खाट पकड़ ली है और डॉक्टर दोनों किडनी फेल होने का संकेत दे चुका है, तब से पापा जी का प्यार उमड़ पड़ा है।”
“भला!” कहते हुए मैं उनको छत की तरफ ले गई, ताकि वह मर्यादित प्रेम सिमट न जाए।
आज इतने दिनों बाद बुआ से मिलना हो रहा था कि कई वसंत और पतझड़ उन्हें याद करते हुए बीत चुके थे। मुझे समझ नहीं आया कि जो इंसान उनसे इतना चिढ़ता था कि यदि वह (बुआ) उनसे पहले खाना खा लें तो महाशय थाली पटक देते थे, वही आज खुद खाना निकालकर उनके सामने रखते हुए थोड़ा और खाने की मनुहार कर रहे थे! इस समय बुआ का चेहरा कंकाल-रूप में भी जीवंत लग रहा था; जैसे पास मृत्यु नहीं, पुनर्जन्म खड़ा हो। शायद बुढ़ापा अपनी बूढ़ी परिस्थितियों के साथ अनुभव और प्रेम को पुनर्जीवित कर रहा था।
मैंने भाभी को गिफ्ट थमाया और बुआ के पास जाकर बैठ गई। बहुत रात हो जाने के बाद भी हम दोनों ने अपने-अपने हिस्से का सुख-दुख बाँटा और न जाने कब सूर्यदेव (दिनकर) भी उसमें शामिल हो गए। फिर तो अपने कर्मक्षेत्र में आना ही था, क्योंकि बच्चों की पढ़ाई और करियर सबसे पहले है; भले ही बाद में उनके लिए आप सबसे बाद की चीज़ बन जाएँ!
मैं भी चली वहाँ से। बाहर की चौखट पर एकाएक मेरी नज़र अटक गई; क्योंकि बचपन में जब भी मैं यहाँ से जाती, बुआ चुराकर पैसे देतीं और कहतीं, “फूफा जी को मत बताना, पैसे को जेब में नहीं, बैग में रखे कपड़ों में डाल लेना।” और वहीं खड़ी होकर मेरे ओझल होने तक देखती रहती थीं। लेकिन आज इस समय चौखट अपनी लाचारी के साथ अकेले विदा कर रही थी मुझे... हमेशा के लिए! जैसे कह रही हो—आजकल इतने दूर के रिश्ते कौन निभाता है अपनों के बाद!
मैं जल्दी से वहाँ से निकली और गाड़ी पर बैठते हुए कहा, “चलिए भैया!” तभी लगा जैसे किसी ने हथेली पर यादों के साथ प्रेम का कोई खोया हुआ पत्र रख दिया हो। सामने देखा तो फूफा जी १०० रुपये लिए खड़े थे। वह १०० का अंक बहुत कुछ कहते हुए हम दोनों की आँखों को भिगोता रहा... और बहुत कुछ धोता रहा...।
- किरण परशुराम चतुर्वेदी
भभुआ , बिहार