“अरे मदना! कहाँ मर गया रे?”
ट्रिंग... ट्रिंग... ट्रिंग...
बॉस ने लगातार घंटी पर घंटी बजाकर मदना को बुलाया। थोड़ी देर बाद मदना हाँफता हुआ कमरे में दाख़िल हुआ।
“जी, प्रणाम हाकिम! प्रणाम! वह... तनिक रोटी बनाने में देर हो गई थी। माफ़ कर दीजिएगा। बस, दस मिनट ही तो देर हुई है।”
“तुम्हारा यह रोज़ का बहाना है। अच्छा, छोड़ो। पहले यह बताओ—जो काम मैंने तुम्हें दिया था, उसका क्या हुआ?”
मदना ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला—
“हाकिम! मैं सोच रहा था कि...”
“क्या?”
बॉस की त्योरियाँ चढ़ गईं। उसने दाँत पीसते हुए कहा—
“अरे बेहूदे! बुद्धू! तुमने सोचा!?”
मदना सहम गया।
बॉस की आवाज़ और तेज़ हो गई—
“यह तो बहुत बड़ा अपराध हो गया है तुमसे! तुम्हें सोचने के लिए किसने कहा? तुम्हारा काम है हाकिम का हुक्म मानना—बस! सरकार ने तुम्हें सोचने के लिए थोड़े ही रखा है!”
वह कुछ क्षण रुका, फिर व्यंग्य से बोला—
“सोचने-समझने का काम हाकिम का है। तुम्हारा काम है आदेश का पालन करना। समझे?”
मदना चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहा।
उस क्षण उसे पहली बार अपनी हैसियत का पूरा अहसास हुआ।
वह अरदली था।
और अरदली का काम था—हुक्म सुनना, हुक्म मानना... और सबसे बढ़कर—सोचना नहीं।
- ई. राणा ब्रजेश
दरभंगा, बिहार