संजोए हैं मेरे पुरखों ने जो जज़्बात हिंदी में (ग़ज़ल) - मनीष 'मोहक'

संजोए हैं मेरे पुरखों ने जो जज़्बात हिंदी में,
सदा महका करेंगे बनके वो सौग़ात हिंदी में।

मुझे लगता है जैसे इसमें सातों सुर समाए हों,
ग़ज़ल के लहजे में करता हूँ जब भी बात हिंदी में।

मैं हिंदी की हिमायत के लिए किस दर पे जाऊँ अब,
अदालत भी नहीं सुनती मेरे हालात हिंदी में।

वतन की तरह ही भाषा हमारी ख़ूबसूरत है,
जहाँ होगा वतन का ज़िक्र, होगी बात हिंदी में।

यूँ ही गुणगान मैं करता रहूँ माँ भारती तेरा,
विचारों की सदा होती रहे बरसात हिंदी में।

ज़माना आज भी क़ायल है ग़ज़लों का मेरी 'मोहक',
ज़माना कल भी गाएगा मेरे नग़मात हिंदी में।


- मनीष 'मोहक'
बेगूसराय, बिहार

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