सज़ा ( लघुकथा) - डॉ. नीलम श्रीवास्तव

सुनीता के मायके में उसकी छोटी बहन की शादी थी। घर के सभी लोग आँगन में विवाह संपन्न होते देख रहे थे, लेकिन सुनीता का बच्चा गर्मी और भीड़ के कारण इतना रो रहा था कि वह मंडप में बैठ ही नहीं पा रही थी। वह बच्चे को घर के बाहर खुले में टहलाने लगी। बहुत देर बाद जब बच्चे को नींद आ गई, तब सुनीता ने उसे बाहर ही एक फोल्डिंग पलंग पर सुला दिया और स्वयं वहीं टहलने लगी, क्योंकि उसके हट जाने पर बच्चे के पुनः जगने की संभावना थी। बाहर मेहमानों का आना-जाना निरंतर चल रहा था; सुनीता के पति, रमेश, बारातियों के स्वागत-सत्कार में लगे हुए थे। सुनीता ने देखा कि रमेश अंदर आए, पानी पिया और बिना कुछ बोले फिर चले गए। सुनीता को अपने पति की इस गंभीरता का कारण समझ नहीं आया। सुबह होते ही रमेश गंभीर मुद्रा में ससुराल से जाने लगे, परन्तु सुनीता ने बड़ी मुश्किल से उन्हें रोक लिया।
दूसरे दिन, बारात वापस जाने के बाद, शाम होते ही रमेश पुनः घर से बाहर निकले तो सुनीता भी उनके पीछे चल पड़ी। कुछ दूर जाने के बाद उसने पति की नाराजगी का कारण जानना चाहा, मगर उसे कोई जवाब नहीं मिला। बहुत आग्रह के बाद जो जवाब मिला, उसे सुनकर सुनीता अवाक् रह गई। पति ने कहा, "रात में सारे लोग आँगन में शादी देख रहे थे; तुम बाहर क्या कर रही थी?" सुनीता ने बच्चे के बारे में बताया, परन्तु पति ने उसे झूठा करार देते हुए यह आरोप लगाया कि वह अपने पूर्व प्रेमी को देख रही थी। सुनीता ने लाख सफाई दी, लेकिन रमेश ने नहीं माना और क्रोधांध होकर इतनी ज़ोर से सुनीता को थप्पड़ मारा कि उसकी एक आँख जैसे बाहर आ गई। सुनीता ने हाथ से अपनी आँख दबाकर ज़मीन पर बैठ गई और सिर्फ इतना कहा, "आपको ज़रा भी दया नहीं आई?" लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला। सामाजिक प्रतिष्ठा के मद्देनज़र वह चिल्लाई भी नहीं और घर के लोगों के पूछने पर उसने बच्चे के द्वारा चोट लगने का बहाना कर दिया। एक सप्ताह तक आँख का इलाज चला, उसके बाद ही वह सामान्य हो पाई। सुनीता सोचती रही, अगर उसने अपने पूर्व प्रेमी को देख भी लिया होता, तो क्या उसकी सज़ा ऐसी मिलनी चाहिए थी?

- डॉ. नीलम श्रीवास्तव 
सीवान, बिहार

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