अपनी माटी, अपनी भाषा, शीतल हवा व पानी,
माँ के आँचल-सी प्यारी है, हिंद की हिंदुस्तानी।
शुभ्र हिमालय-सी गौरवमय, संरक्षण देती है,
तृप्तिदायिनी माँ गंगा-सी, संतृप्ति देती है।
प्राणप्रदायक, प्राणवायु-सी, पल-पल ही संबल है,
पोषक खेतों की फ़सलों-सी, इससे यह जीवन है।
सुमनों की सुरभि-सम मोहक, मन को तृप्ति दिलाती,
उषा की आभा-सी प्यारी, सबकी हिंदी प्यारी।
माँ में ममता, प्रेम पिता में, बहना नेह भरी है,
भैया, दादी, नानी, चाची में माधुर्य घुला है।
अखिल विश्व की अब प्यारी है, रामदेव टीवी से,
पूरी दुनिया इसको जाने, अटल, स्वराज, मोदी से।
आएँ, लें संकल्प आज, नित गौरव-वृद्धि करेंगे,
मन-वचन-काय से सभी जगह, हिंदी ही प्रयोग करेंगे।
— इंजी. अरुण कुमार जैन
अमृता हॉस्पिटल, सेक्टर 88, फ़रीदाबाद, हरियाणा