उर्दू और हिंदी ग़ज़ल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर, सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार श्री राजेन्द्र पासवान 'आर. पी. घायल' जी (1949 – 2026) के निधन की खबर अत्यंत दुखद और साहित्य जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनकी अशआर में जो सादगी, नफ़ासत और रवानगी थी, वह उनके चले जाने के बाद भी उनके शेरों के ज़रिए हमेशा महकती रहेगी।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और परिजनों व प्रशंसकों को यह गहन दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। नम आँखों से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि!
उसका लिया जो नाम तो ख़ुशबू बिखर गई,
तितली मेरे क़रीब से होकर गुज़र गई।
अधखुली आँखों से उसने जब कभी देखा मुझे,
मेरे मन की हर उदासी, हर ख़ुशी से भर गई।
फूल जब दामन से उसके गुफ़्तगू करने लगे,
उसके दामन की ख़ुशबू से फूल की ख़ुशबू डर गई।
हुस्न है तो इश्क़ है, कितना ग़लत कहते हैं लोग,
लैला-मजनूँ की मोहब्बत नाम रोशन कर गई।
उसकी आँखों की चमक से या वफ़ा के नूर से,
रात काली थी मगर वो रोशनी से भर गई।
याद है उसकी कि 'घायल' भोर की ठंडी हवा,
गुदगुदाकर जो मुझे फिर आज तन्हा कर गई।
— आर. पी. घायल साहब की ग़ज़ल
"अलफ़ाज़ ख़ामोश हो गए हैं, मगर उनकी ग़ज़लों की महक ता-उम्र ज़िंदा रहेगी।"
घायल साहब का जाना साहित्य जगत, ग़ज़ल-परंपरा और हम सभी प्रशंसकों के लिए एक ऐसा शून्य छोड़ गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। उन्होंने अपनी सादगी, गहरे जज़्बात और रवां अशआर से जिस तरह दिलों को छुआ, वह हमेशा स्मरणीय रहेगा।
वे भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन अपनी इन अमर पंक्तियों और कला के माध्यम से वे सदा अमर रहेंगे—
"याद है उसकी कि 'घायल' भोर की ठंडी हवा,
गुदगुदाकर जो मुझे फिर आज तन्हा कर गई।"
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में परम शांति प्रदान करें एवं शोक संतप्त परिवार व प्रशंसकों को यह असीम दुख सहन करने का बल दें।
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि! ॐ शांति! ॐ शांति! ॐ शांति! 🙏
- बोधायन पत्रिका