जब चोरों की बाढ़, जुआरी बढ़ आकाश छुएगा।
कहीं, किसी भी जगह बाल, स्त्री पर ज़ोर करेगा।
जब, अपनों को भूल, पिता-माँ से, वह काम कराए।
और साधु-पुरुषों को हर क्षण, वह लताड़ लगवाए।
जिन लोगों का रहे आचरण, दूषित, खल या कामी,
कलि-काल में, राक्षस बनकर, ग्रसता है हरामी।
और भक्ति का बीज उदित हो, जहाँ किसी के हृद् में,
प्रभु आ जाते, उसी समय, उसके रक्षण, संचित में।
प्रभु सर्वत्र, सभी जीवों में, सभी स्थान पर व्याप्त,
जो भी प्रेम-भाव से माँगते, देते हैं पर्याप्त।
जहाँ-जहाँ तक नज़र जा रही, कण-कण में भगवासी,
उन्हें यहीं हृद् में ढूँढो नर, क्या काबा, क्या काशी!
— त्रिपुरारी कुमार पाण्डेय