14 अगस्त की तिथि केवल इतिहास का एक पन्ना नहीं है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की चेतना पर लगा वह गहरा ज़ख्म है जिसकी टीस दशकों बाद भी साहित्य की पंक्तियों में महसूस की जा सकती है। 1947 का विभाजन केवल दो देशों की सीमाओं का खिंचना नहीं था; वह सदियों पुरानी साझी संस्कृति, भाषा, धरोहरों और मानवीय रिश्तों का निर्दयी विभाजन था।
इतिहास राजनीति के आंकड़े दर्ज करता है—कितने लोग विस्थापित हुए, कितनी संपत्ति का नुकसान हुआ। लेकिन साहित्य उस दौर की आत्मा की चीख दर्ज करता है। ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ पर आइए देखें कि हिंदी और भारतीय साहित्य ने इस त्रासद परिघटना को किस तरह अपनी संवेदना में सहेजा और दर्ज किया है।
विभाजन के दर्द पर लिखे गए हिंदी कथा-साहित्य ने न केवल उस समय के यथार्थ को उकेरा, बल्कि मनुष्यता के गिरते और संभलते स्तर को भी रेखांकित किया।
भीष्म साहनी का 'तमस': विभाजन की विभीषिका पर लिखा गया यह उपन्यास एक ऐसा दस्तावेज है जो दिखाता है कि कैसे धर्मंधता और राजनीतिक षड्यंत्र रातों-रात दशकों पुराने भाईचारे को राख में बदल देते हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी 'अमृतसर आ गया है' एक चलती ट्रेन के डिब्बे के भीतर बदलते मानवीय व्यवहार और भय की पराकाष्ठा का जीवंत चित्रण करती है।
कमलेश्वर का 'कितने पाकिस्तान': यह उपन्यास केवल 1947 के विभाजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इतिहास की अदालत लगाकर यह सवाल पूछता है कि मनुष्य की नफ़रत और कट्टरता ने इतिहास में कितनी बार इंसानों के बीच दीवारें खींची हैं।
यशपाल का 'झूंठा सच': दो भागों ('वतन और देश' तथा 'देश का भविष्य') में बँटा यह महाउपन्यासात्मक ढांचा लाहौर से दिल्ली तक फैले विस्थापन, शरणार्थी शिविरों की नारकीय स्थिति और महिलाओं के आघात को अत्यंत प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करता है।
कृष्णा सोबती और सआदत हसन मंटो: कृष्णा सोबती का 'जिंदगीनामा' और मंटो की कहानियां (विशेषकर 'टोबा टेक सिंह') विभाजन की उस सनक और विडंबना को उजागर करती हैं जहाँ इंसान मानसिक रूप से अपनी ज़मीन से अलग होने को स्वीकार ही नहीं कर पाता।
विभाजन के समय कवियों ने शब्दहीन कर देने वाली पीड़ा को अपनी कविताओं में ढाला। सीमा के दोनों पार कवियों ने इस मानवीय त्रासदी पर आँसू बहाए।
पंजाबी की महान कवयित्री अमृता प्रीतम की प्रसिद्ध पंक्तियाँ विभाजन के दर्द की अमर अभिव्यक्ति हैं, जहाँ वे वारिस शाह को पुकारती हैं:
"अज्ज आखां वारिस शाह नूं, कित्तों कबां विचों बोल,
ते अज्ज किताबे-इश्क दा, कोई अगला वर्क़ा फो ल।"
(आज मैं वारिस शाह से कहती हूँ कि अपनी कब्र से बोलो, और आज प्रेम की किताब का कोई नया पन्ना खोलो।)
हिंदी कविता में भी अज्ञेय, मुक्तिबोध और नागार्जुन की पंक्तियों में इस विस्थापन और नफ़रत के खिलाफ एक प्रतिरोधी स्वर और मानवीय करुणा स्पष्ट दिखाई देती है।
आज जब हम 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में याद करते हैं, तो साहित्य हमें यह सिखाता है कि इस दिन को याद करने का उद्देश्य नफ़रत को दोहराना या पुरानी कड़वाहट को जगाना नहीं है।
साहित्य का दायित्व हमें यह याद दिलाना है कि
सांस्कृतिक जड़ों का मूल्य: सीमाएं ज़मीन बाँट सकती हैं, लेकिन साझा इतिहास, भाषा और लोक-संस्कृति को नहीं मिटा सकतीं।
राजनीति जब भी इंसानों को बांटेगी, साहित्य हमेशा जोड़ने और घावों पर मरहम लगाने का काम करेगा।
'तमस' या 'झूंठा सच' पढ़ना हमें सिखाता है कि सामाजिक सौहार्द कितना नाज़ुक होता है और इसे बचाए रखना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
विभाजन की विभीषिका से उपजा साहित्य केवल शोकगीत नहीं है, वह मानवता की पुनर्स्थापना का संकल्प भी है। 'बोधायन' के पाठकों के लिए यह दिन यह सोचने का अवसर है कि हम अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत के ज़रिए एक ऐसे समाज का निर्माण कैसे करें जहाँ प्रेम, सहिष्णुता और संवाद ही सर्वोच्च मूल्य बने रहें।
- बोधायन पत्रिका