राष्ट्र प्रेम हर मन (देशभक्ति कविता) - ई. अरुण कुमार जैन


प्राणों का उत्सर्ग कर दिया, भारत माँ के आँचल में;
सुख-सुविधाएँ सारी छोड़ीं, कूद पड़े रण-आँगन में।
माँ, पत्नी, बेटी की ममता, उन्हें तनिक न बाँध सकी;
पिता, भाई व पुत्र-प्रेम भी, राष्ट्र-प्रेम से बड़ा नहीं।
शीश कटा माँ के चरणों में, हम सब पर उपकार किया;
उन्हीं शूरवीरों के बल पर, स्वतंत्रता-उपहार मिला।
|| भारत माँ शरणम्... ||

रोटी, घर, कपड़े व शिक्षा, रोजगार व स्वास्थ्य मिला;
श्रेष्ठ जनों ने किए यत्न सब, नव विकास का द्वार खुला।
नित्य नए उद्योग यहाँ पर, ज्ञान-विज्ञान प्रगति करता;
आज विश्व में आगे भारत, कीर्ति-यश प्रतिदिन बढ़ता।
कुछ वैरी भी साथ हमारे, जिन्हें न यश-सुख भाता है;
हिंसा, व्यसन, विनाश, विध्वंस का, नशा उन्हें नित आता है।
|| राष्ट्र प्रेम हर मन... ||

मुजाहिदीन, खालिस्तानी, अलकायदा जैसे विनाश करें;
बलात्कार, हिंसा, जिहाद व तोड़-फोड़ में रचें-बसें।
पतित कई हैं भारत-भू पर, षड्यंत्र जो करवाते हैं;
नागनाथ व साँपनाथ मिल, देश रसातल लाते हैं।
आओ साथ बढ़ें, मिल इनका, हम सब पर्दाफाश करें;
आस्तीन के साँप देश के, मिलकर आज विनाश करें।
|| पापी हों नष्टम्... ||

कर्तव्यनिष्ठ हों शासक, अफसर, शिक्षक, डॉक्टर, धर्मगुरु;
इनके साथ चलें सब मिलकर, सृजन-प्रगति अध्याय शुरू।
ऋषभदेव प्रभु, राम, कृष्ण, वीर शिवा, प्रताप महान;
तिलक, भगत, आज़ाद, नेताजी सावरकर से आभावान्।
शांति, वीर, गुरु विद्यासागर, इनके पथ पर सदा चलें;
विश्वगुरु के पद पर अपने, भारत को आसीन करें।
|| राष्ट्र प्रगति हर मन... ||

हिमगिरी के उत्तुंग शिखर से, भारत की हुंकार यही;
देश के सारे दुश्मन सुन लें, उनका है संहार अभी।
रहें राष्ट्र में राष्ट्रभक्त बन, नेह, प्रेम, विश्वास भरें;
बढ़ें सृजन के पथ पर प्रतिपल, रामराज्य साकार करें।
मीरजाफर, क़ासिम, यारलुत्फ खाँ, उन सबका होगा संहार;
स्वातंत्रत्य के महापर्व पर, होगा राष्ट्र का पुनरुद्धार;
सतत प्रगति, उत्थान, विजय के, नित्य खुलेंगे, अभिनव द्वार।


— ई. अरुण कुमार जैन
(सेक्टर 88, फ़रीदाबाद, हरियाणा)

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