वीर जवान (दोहे) - मधु रानी लाल


सैनिक मेरे देश के, जीवट के पर्याय,
अपनी वीरता से लिखें, शौर्य का अध्याय।

बन सरहद पर संतरी, रहते डटे जवान,
उनके कारण चैन से, सोता हिंदुस्तान।

वीर बाँकुरे चल पड़े, दुश्मन को ललकार,
रक्त-तिलक माथे लगा, भरें प्रबल हुंकार।

करें राष्ट्र-सेवा सतत, निर्विकार निष्काम,
शीश कटाकर वे करें, जीवन उसके नाम।

हर बाधा से जूझते, साहस रखें अकूत,
ध्वस्त करें हर व्यूह को, भारत माँ के पूत।

करें सुरक्षित शत्रु से, भेज काल के गाल,
रक्ताभिषेक कर चले, वीर धरा के लाल।

उन्हें चुनौती जब मिले, चलें कफ़न सर धार,
आँख दिखाएँ मौत को, दें उसको ललकार।

सह मर्मांतक पीर भी, नहीं निकलती आह,
मन में भारत के लिए, मर-मिटने की चाह।

चिर-निद्रा में सो गया, ओढ़ तिरंगा आज,
सीमा-रक्षा प्रण निभा, रखी देश की लाज।

जाए कभी व्यर्थ नहीं, वीरों का बलिदान,
उन्हीं-सरीखा प्राण लुटा, रखना तुम सम्मान।


— मधु रानी लाल
(आर. पी. एस. मोड़, पटना, बिहार)

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