वो दिल कहाँ से लाएँ, वो नज़र कहाँ से लाएँ,
मिट जाएँ जो वतन पर, वो जिगर कहाँ से लाएँ।
नफ़रत की आँधियों में बुझने लगे हैं रिश्ते,
उल्फ़त की रौशनी का वो घर कहाँ से लाएँ।
मज़हब नहीं सिखाता नफ़रत की कोई भाषा,
चैन-ओ-अमन से संवरी वो नगर कहाँ से लाएँ।
नफ़रत के इस धुएँ में घुटने लगी है दुनिया,
उल्फ़त की फिर महकती वो सहर कहाँ से लाएँ।
मंदिर भी है हमारा, मस्जिद भी है हमारी,
जहाँ भेद न हो कोई, वो दर कहाँ से लाएँ।
ईमान की डगर पे जो उम्र भर चले थे,
उन्हें हम कहाँ से ढूँढें, वो बशर कहाँ से लाएँ।
- रंजना लता
समस्तीपुर, बिहार